आलेख

ईश्वर का धन्यवाद

नीतू मौर्या

बात आज से आठ साल पहले की है। हम सभी लोग (जिनमें मैं, मेरे पति, मेरा बेटा और मोहल्ले के कई लोग )
पूर्णागिरि  में दर्शन करने गए थे। वहां से वापसी में हम सभी ने गोला गोकर्णनाथ और नैमिष (नीमसार) में भी दर्शन किए।नैमिष में मां ललिता देवी के दर्शन के समय हम सभी को कुछ न कुछ प्रसाद मिला । किसी को फूल, किसी को फल किसी को मिठाई।पर मुझे मेरे आंचल में सुहाग सामग्री मिली।

हम सभी  हंसी खुशी वापस लौट आए। जिस दिन हम वापस आए मेरी मौसी का बेटा मेरे घर आया। मौसी का घर मेरे घर से सात किलो मीटर दूर है। जब मेरा भाई घर जाने लगा तो पति ने कहा कि चलो मैं घर पर छोड़ देता हूं। और मेरा भाई और मेरे पति दोनों बाराबंकी के लिए निकल गए।
रास्ते में उन दोनों का एक्सीडेंट हो गया ।
जिसने भी मेरे घर पर इस बात की जानकारी दी उस का कहना था कि मेरे पति उस एक्सीडेंट में नही रहें।

जब मुझे इस बात का पता चला तो मेरे दिल से बस यही आवाज निकली कि “हे मां ये क्या हुआ? आज ही तुमने मुझे सुहाग सामग्री देकर सुहागन होने का आशिर्वाद दिया है और आज ही ये सब कुछ हो गया। मां मैं कुछ नही जानती अगर आज मेरे भाई या पति को कुछ भी हुआ तो मैं मान लूंगी कि ईश्वर का कोई वजूद नही है। पहले भी मैं अपने दो बच्चों को खो चुकी हूं अब किसी और को नही खो सकती, मां कृपा करों 🙏

पूरे रास्ते मैं बस यही प्रार्थना करती हुई अस्पताल पहुंची।
जब मैंने अपने पति को देखा तो ईश्वर के प्रति श्रद्धा से मेरा सर झुक गया। मेरे पति को सिर्फ हाथ पैर और चेहरे पर ही चोटें आई थी। भाई के भी हल्की चोटें आई थी।

ललिता मां को पहले से ही इस घटना के बारे में पता था इसलिए तो उन्होंने पहले ही मुझे सुहागन होने का आशिर्वाद दे दिया था।
सच में उस ईश्वर का जितना भी धन्यवाद दूं कम ही है।

जय मां ललिता देवी
नीतू नन्द किशोर मौर्या

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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