आलेख

क्या सुख ओर क्या दुख

Dr. Ramen Goswami
शुद्ध समचित्त साधक न तो भौतिक वस्तुओं की हानि और प्राप्ति पर सुखी होता है और न ही दुःखी होता है, न ही अच्छे-बुरे की प्राप्ति के लिए उत्सुक होता है और न ही कुछ न पाकर दुःखी होता है। यदि इस प्रकार का व्यक्ति अपनी प्रिय वस्तु को खो देता है, तो वह कभी शोक नहीं करता। इसी तरह, यदि समचित्त व्यक्ति को वह नहीं मिलता जो वह चाहता है, तो वह व्यथित या खुश नहीं होता है।

वह सभी प्रकार के शुभ, अशुभ और पापपूर्ण कार्यों के लिए कठोर अनुशासित है। वे सभी पालन करने के लिए तैयार हैं और सर्वोच्च भगवान की संतुष्टि के लिए सभी प्रकार के जोखिमों का त्याग करते हैं।
“उनकी भक्ति सेवा के निर्वहन में कोई भी बाधा नहीं है। ऐसा भक्त कृष्ण को बहुत प्रिय है।”
संतुष्ट व्यक्ति हर स्थिति में खुश रहता है, चाहे उसे विलासिता का जीवन मिले या बहुत स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ मिले या बहुत कष्टदायक क्षण मिले, वे सभी दोनों स्थितियों में समान रहते हैं, न ही वह किसी भौतिक चीजों और बाहरी वस्तुओं की परवाह करता है।
वह कभी एक छोटे से घर में रहता है, और वह कभी-कभी एक बहुत ही महलनुमा इमारत में रहता है, वह न तो आकर्षित होता है और न ही व्यथित होता है। श्री कृष्ण ने भगवद गीता में अर्जुन के साथ अपनी बातचीत के माध्यम से हमें इस अभूतपूर्व अवधारणा के बारे में बताया।
गीता कहती है कि दुनिया आपका कुछ भी नहीं है जो जीवन का कड़वा सच है। और जिस मुहावरे का आपने उल्लेख किया है, उसके अनुसार सुख और दुख एक ही हैं क्योंकि कुछ भी स्थायी नहीं है। न सुख न दुख। न तुम हर समय सुखी रह सकते हो, न तुम हर समय दुखी रह सकते हो। वे एक ही सिक्के के दो पहलू की तरह हैं, जो स्थिति के अनुसार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। कृष्ण कुरुक्षेत्र में अर्जुन से कहते हैं कि “यह भी बीत जाएगा” जिसका स्पष्ट अर्थ है कि अब आप कितने भी खुश या दुखी हों, वह भी पलक झपकते ही बीत जाएगा।

Dr. Ramen Goswami

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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