आलेखसाहित्य

मर्द औरत की बराबरी

हमारे दोस्त रायबहादुर एक बराबरी किस्म इंसान थे। उनका मानना था जो काम मर्द कर सकते हैं वो काम औरतें भी कर सकती हैं। मगर वो जिस तरफ होते हैं वो उसी को अलग तरफ से देखने लगते हैं। बात जरा उलझी सी है मगर बात उनके हिसाब से काफी बड़ी है।

उनका ये भी कहना है अगर औरत मर्द के करने वाले सारे काम कर सकती है तो मर्द औरतों वाले काम

क्यों नहीं कर सकता। राय बहादुर ने अपनी ही जैसी ऊंची सोच वाले 10 15 साथियों की टोली बना मर्दों को बराबरी का दर्जा दिलाने का मुद्दा सबके सामने लाया । पहले राय बहादुर और बाकी साथियों ने पच पर सारी वो बातें लिखी जो मर्द और औरत के बीच फर्क पैदा करती है। राय बहादुर ने हाथ में कलम ली और

बाकी लोग अपनी तरफ से राय देते गये। रायबहादुर फर्क करने वाली बातें लिखते जा रहे थे ।

कोई कहता मर्दों को खाना पकाने की आजादी होनी चाहिए तो दूसरा कहता मदों को खुले में नहाने पर रोक होनी चाहिए मर्द को बस रेलगाड़ियों में औरतों सी जगह मिलनी चाहिए एक कहता मर्द को भी औरतो द्वारा छेड़ा जाना चाहिए इन्हें भी ब्यूटी पार्लर में जाने की अनुमति होनी चाहिए और मों को भी पेशा करने पर बढ़ावा देना चाहिए। कागज सियाई खत्म होने को आय में वही राय बहादुर के बाजू में बैठा हुआ सबकी मांगे सुन रहा था। इतने में राय साहब ने खुद मुझसे बोला आप भी कुछ सलाह दे मुझे जो ठीक लगा वो मैंने कहा मेरे हिसाब से सबसे पहले हमें भगवान के सामने हमें आंदोलन करना चाहिए ताकि वो सिर्फ औरतों के पेट में बच्चा ना दें बल्कि मर्दों के भी पेट में बच्चा दे। अब वहां बैठे सभी लोग गुमशुदगी से हो गय, राय साहब खुद कुछ ना कहें पाए मगर अगली बार या फिर कभी भी उन्होंने मुझे अपने इस आंदोलन में शामिल ना किया ।

आंदोलन बड़ी तेजी से शहर में फेल गया । हर गली कूचे पर मर्दों का पेशा खुल गया शहर में खुलेआम मर्दों को छेड़ा जाने लगा मगर जब घरों तक आंदोलन पहुंचा तो सब खत्म हो गया। जब भी घर में मर्द बराबरी की बात करते तो औरतें उनके हाथों में सब्जी तरकारी पकड़ा बाकायदा उन है बराबरी देती । यहां तक कि औरतों ने मर्दों का रास्तों पर चलना मुश्किल कर दिया था। उन्हें अपने बराबर बनाने के लिए दिन भर घर का काम करवा एक समान बना देती राय साहब इतना कुछ होने के बाद भी अपने इस आंदोलन में जियो जान से टिके रहे मगर जब उनकी खुद की श्रीमती जी मायके से लौट आई और उन्होंने भी इस आंदोलन में अपना योगदान देते हुए राय साहब को बराबर का मान बराबर से घर का कामकाज करवाया तो उसी शाम उन्होंने इस आंदोलन को खत्म कर साफ जाहिर कर दिया जिस दिन हम मर्द बच्चे पैदा करने लगेंगे उस दिन हम फिर से इस आंदोलन को शुरू करेंगे और उम्मीद करता हूं हमे बराबरी जरूर मिलेगी।

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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