आलेख

माँ की चिंता

पूजा शर्मा

माँ को बहुत चिन्ता होती है सबको पानी पीने से मतलब है सिर्फ मटके को भरने की चिंता माँ को है ,ढाॅंककर रखना पानी को सिर्फ माँ को चिन्ता बच्चे स्वच्छ रहे , बच्चे तो सिर्फ खेलकूद और घर में आना पानी पीना और खाना खाना उन्हें कोई चिन्ता ना हुई जितने बढ़े होए बच्चे उतने काम हुए माँ को ना कभी चिन्ता ना हुई फुर्सत आज भी माँ दौड़ दौड़ कर काम करती है,
मटका गरमी में बार -बार खाली हो जाता माँ उसी को भरने में लगी रहती है ना तो उसे गरमी का
एहसास होता है सिर्फ बच्चों की चिन्ता होती है,
मटका में फिर भी बार -बार ठंडा पानी रहता क्योंकि माँ देख रेख करती है,
गरमी में पानी की बूंद- बूंद को तरसते है क्योंकि गरमी के बजहसे धरती का पूरा पानी सूखने लगता है इसका कारण था हम सब क्योंकि पेड़ – पौधे, वन काटते जा रहे है वर्षा नही होती है गरमी के दिनों में माँ को ज्यादा पानी भरकर रखना पड़ता था एक दिन सबको प्यासा ना रहना पड़े चिन्ता माँ को थी,
धरती माँ की रक्षा और माँ की चिन्ता बहुत जरूरी है वो माँ हमारा कितना ख्याल रखती है

धरती माँ पानी देती और माँ उसको भरकर स्वच्छ रखती,

स्वरचित
पूजा शर्मा
जिला विदिशा मध्यप्रदेश

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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