आलेखसाहित्य

मेरी लेखनी मेरी पहचान

__राखी कौशिक धामपुर

कभी- कभी तो मन करता हैं,की लिखना छोड़ दूँ मगर फिर सोचती हूँ की एक साहित्यकार की सबसे बड़ी ताकत तो उसकी लेखनी ही हैं।जो हर परिस्थिति में उसका साथ निभाती हैं।और सुख हो या दुख सभी में साथ निभाती हैं। मेरे सुख- दुख की साथी बन जाती हैं।मेरे मन के भावों को व्यक्त कर जाती हैं।ये लेखनी ही हैं जो हरपल मुझे संभालती हैं।जब कभी मैं दुखी होती थी तो,रो देती थी।मगर अब ये लेखनी ही हैं।जो मेरा सहारा बन जाती हैं।ये लेखनी ही हैं जो मुझें पहचान दिलाती हैं।साहित्य की प्यारी सी दुनिया में मुझें ले जाती हैं।बहुत सारा प्यार आशीर्वाद और अपनापन दिलाती हैं।बहुत सारे प्यारे -प्यारे रिश्तों से मिलाती हैं।कितनी भी पीड़ा हो लिखकर भुला देती हूँ।अपने सारे गमों को लेखन में छिपा देती हूँ।लिखती हूँ जब कभी मन के भावों को पढ़ने पर सभी को रुला भी देती हूँ। बाँटती हूँ खुशियाँ चारों ओर पर गम ही मिल पाता हैं।मेरे लेखन का जादू तो चहूँ ओर फैल जाता हैं।कभी- कभी शब्दों के अभाव में कुछ लिख नही पाती हूँ।परन्तु न जाने कैसे इस लेखनी के जादू से सब कुछ कह जाती हूँ।ये लेखनी ही मुझें हँसना सिखाती हैं।कुछ अच्छा कुछ सच्चा लिखना सिखाती हैं।कभी- कभी तो मुझें खुद से ही रूबरू कराती हैं।ये लेखनी ही हैं जो मेरा साया बन जाती हैं।गुस्सा हूँ मैं चाहे जितना मुझें शांत कर जाती हैं।मुझें अपने आसरे में लेकर सब लिखवा देती हैं।दुखी हूँ मैं जब भी कभी तो गले लगा लेती हैं।सपने हो या सच्चाई सभी को बयां कर देती हैं।ये लेखनी ही हैं जो मुझें झट से मना लेती हैं। मुझें एक नया नाम और पहचान दिला देती हैं।जिंदगी के इस लम्बे सफर में प्रत्येक पथ पर मेरा साथ निभाती हैं ये मेरी प्यारी सी लेखनी ही हैं।जो मुझें सबसे अलग बना देती हैं।

आकर मेरे पास में, थामों मेरे हाथ।
मुझकों गोदी में बिठा,ले चल कान्हा साथ।


राखी कौशिक धामपुर

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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