आलेख

संविधान निर्माता अम्बेडकर जी और समता मूलक समाज के स्वप्नद्रष्टा

अशोक पटेल “आशु”

भारतीय संविधान के निर्माता और समता मूलक समाज के स्वप्नद्रष्टा डा भीमराव राव अम्बेडकर जी का जन्म 14 अप्रैल सन 1891 को हुआ था।अम्बेडकर जी का जन्म ही मानव मात्र के अधिकार,हक,और सम्मान के लिए हुआ था।अम्बेडकर जी ने मानव समाज के सबसे पीछड़े,निचले,कुचले दबे हुए लोगों के उद्धार के लिए जीवन भर काम करते रहे।और तब तक काम करते रहे जब तक उन्होंने उनका अधिकार नही मिल गया।अम्बेडकर जी ने समाज की कुरीतियाँ, अंधविश्वास, छुआ-छूत,वर्ग-भेद को खत्म करने का प्रयास किया।साथ ही साथ डॉ भीमराव अंबेडकर ने न सिर्फ संविधान बनाने में अहम भूमिका निभाई बल्कि एक आर्थिक विशेषज्ञ के रूप में भी उन्होंने देश के नवनिर्माण के लिए बहुत बड़ा योगदान दिया।
आइए उनके कुछ सारगर्भित विचारो से,परिचित होते हैं जिन विचारो से मानव समाज को एकता,समरसता का संदेश दिया
वो कहते हैं-
“मुझे वह धर्म पसंद है जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व सिखाता है।”
अम्बेडकर जी ने सबसे बड़ा धर्म उनको माना जिसमे मनव को समानता,स्वतंत्रता के साथ जीने का अधिकार मिले।और उस समाज मे भाईचारे को बढ़ावा मिले।जहाँ सभी एक समान हो।
इसी प्रकार वो आगे कहते हैं-
“धर्म मनुष्य के लिए है न कि मनुष्य धर्म के लिए।”
धर्म का सम्बन्ध मनव से है,जिसके माध्यम से मनव मात्र का कल्याण हो।वह धर्म,धर्म नही जिससे,मनव समाज मे भेदभावना उतपन्न हो।मनव का अहित हो।
इसी प्रकार उन्होंने विचारों के सम्बंध में कहा कि-
“मनुष्य नश्वर है, उसी तरह विचार भी नश्वर हैं। एक विचार को प्रचार-प्रसार की जरूरत होती है।जैसे कि एक पौधे को पानी की। नहीं तो दोनों मुरझाकर मर जाते हैं।”
विचारों की अभिव्यक्ति पर उन्होंने कहा हमे मनन चिंतन करने की आवश्यकता है।जिसके कारण हमारे मन मे नए-नए विचारों की उतपत्ति होती है।और जिस विचारों की हम तलाश करते हैं,वह हमे प्राप्त होती है।एक तरह से  विचारों में मन्थन होता है।
इसी तरह वो
समानता के सम्बंध में बहुत अच्छी बात कहते हैं-
“समानता एक कल्पना हो सकती है, लेकिन फिर भी इसे एक गवर्निंग सिद्धांत रूप में स्वीकार करना होगा।”
वो कहते हैं कि समानता भले ही कल्पना हो सकती है।पर इसे गवर्निंग रूप से अमलीजामा पहनाना ही होगा।सैद्धांतिक रूप से स्वीकार करना ही होगा।
बुद्धि के सम्बंध में अम्बेडकर जी ने कितनी सत्य और अकाट्य बात कही-
“बुद्धि का विकास मानव के अस्तित्व का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए।”
मनव समाज मे शिक्षा की अत्यंत आवश्यकता है।बिना शिक्षा के कोई समाज विकास कर ही नही सकता।समाज के विकास का निर्धारण उसकी शिक्षा है न कि उसका जाति।वो कहते हैं कि मानव अपनी अस्मिता,अपना अस्तित्व को यदि बचाना चाहता है तो उसे शिक्षित होना ही होगा।और यही उसका अंतिम लक्ष्य भी होना चाहिए।
उनके विचार,सिद्धांत,आदर्श और उनके योगदान को लेखनीबद्ध करना सम्भव नही।
उनका योगदान अथाह सागर की तरह विशाल है।जिन्होंने अभावों और जाति
वर्ग-भेद समाज में रहकर उस लक्ष्य को प्राप्त किया जो विश्व के इतिहास में अकल्पनीय लगता है।पर सत्य है।यह भारत के लिए गौरव और अभिमान की बात थी जिन्होंने सबसे पहले प्रशासनिक सेवा से लेकर शासन के उच्च पदों अर्थात संविधान शिल्पी तक के रूप में अपना सफर किया।और भारत के संविधान के लिए भारतीय जनमानस के लिए अपने आप को समर्पित किया।और एक नए समतामूलक सभ्य समाज की कल्पना करते हुए मौलिक सिद्धांतों को प्रतिपादित किया।आइए उनके विचारों को आत्मसात करें और एक नए भारत के निर्माण में अपना महती भूमिका निभाएँ।
प्रस्तुतकर्ता-
अशोक पटेल “आशु”
व्याख्याता-हिंदी
तुस्मा,शिवरीनारायण(छ ग)
9827874578

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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