आलेखसाहित्य

सूरज से नयन मिलाएं सखियों

__निवेदिता रश्मि

गर्मी में पहले से झुलसा हुआ मन , इस झुलसते तन का साथ तो क्या देगा , और झुलस के झोकर जाता है ।
जी हां , तापमान वृद्धि से मानसिक तापमान में स्वतः उत्थान हो रहा है ।
कितनी भी सांसे लंबी भर रही हूं , मन का चिल्लम बुझता ही नहीं है ।
जब से सूरज कि तपिश बढ़ी है , सुती वस्त्रों का अवलंबन ले लिया है । पर हां , कमीज़ फिर भी साड़ी का रोल प्ले नहीं कर सकते । मुझे सलवार –कमीज़ पहनने में सहूलियत होती है । मम्मी की सूती साड़ी पर घर में आजमाइश हुई है ।
कार्यस्थल में पहनने का सहुर नहीं अभी तक ।
ललचाती नेत्रों से ६ गज के अभ्र को देखती हूं , पर लपेटने का साहस नहीं कर पाती ।
साड़ी बेहद पसंद ! शिफॉन , जॉर्जेट , क्रेप , ऑर्गेंजा , ब्रासो और सबसे बढ़ के सिल्क की दीवानी हूं !
पर सूती साड़ी का कलफ नहीं संभाल पाती ।
कुर्ते के साथ कॉटन प्लाजो में कुछ राहत है । कई सखियां तो अंतः – वस्त्र को किनारा कर देती हैं इस गर्मी में ।
अपने कम्फर्ट को प्रिफरेंस देना ! मुझे तो बेहद चमत्कारी लगा । दिल से शुभकामनाएं उस सखी को । कि ये भी एक स्त्रीवाद है , ऑफिस में सबकी नजर के सामने फ्री , बेपरवाह रहना ।
मैंने भी घर में ये एक्सपेरिमेंट शुरू कर दिया है , ऑफिस तक जाने में ऐसे बिना ब्रा के , और साहस की आवश्यकता है ।
मटका मेरा दूसरा तारणहार बना है । मटके में जल भर रखती हूं । सत्तू , बेल का शरबत , लस्सी आदि सभी पेय पदार्थों के लिए मटके की निर्भरता ।
फ्रिज का पानी सेहत के लिए तेजाब का कार्य करता है ।
ठंडा पेय कार्बन युक्त होता है , फिर बर्फ तो आंतों के लिए जैसे यमदूत का कार्य करता है ।

तो इस गर्मी , सत्तू पीना , पुदीने का शरबत , लस्सी , दही , बेल , तरबूजा , खीरा इन्हीं सब का आश्रय है ।
नींबू को बहुत याद कर रही हूं , पर उसके भाव तो इतने बढ़े हैं कि ! खैर गुड़ भी एक विकल्प है जल के साथ खाने का ।

हम आम के टीकोरहा को पका कर उसका शरबत भी पीते हैं । खूब मजेदार लगता है ।

रात्रि में कमरे की खिड़की खुली रहती है , एक पंखा चलता रहता है । मुझे रात्रि में तपिश कम महसूस होती है ।
मैं सनसनाते हवाओं के आगोश में लेट जाती हूं ।
सुबह के नयनाभिराम प्रभात बेला में , कोयल की कूक , आम और महुए की मदमस्त महक ! नथुने में जब ये गंध प्रवाहित होती है तो जीवन के मादकता का अनुभव होता है ।
सोचा है , विपरीत परिसथितियों में भी अपनी राह ढूंढ़ लूंगी , तो तपो भैया सूरज । मैं इस तपिश को भी प्रसन्नता से भोग लूंगी ।
आप सब भी खूब सत्तू –प्याज खाएं । आम का अचार और महुआ का लपसी बनाएं ।
सूती साड़ी जरूर आजमाएं ,वो भी बिना ब्लाउज के और अपने स्त्रीत्व का सुख उठाएं ।
आएं सूरज से नयन मिलाएं ।

निवेदिता रश्मि
छपरा , बिहार

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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