आलेख

कैसे पहुँचूँ

डॉ मधुबाला सिन्हा

घर के छत पर खड़ा सोचे मन
कैसे पहुँचूँ अब मंजिल तक

चलकर जाने कैसे आया वह
मजबूरी थी या बहुत जरूरी
कितनी दूर होगी यह मंजिल
एहसास की थी मेरी मजबूरी
जाना कहाँ है पता नहीं मुझे
क्या पहुँचूंगी मंजिल तक
घर के छत पर खड़ा सोचे मन
कैसे पहुँचूँ मंजिल तक

भरी थी नाव पतवार थाम कर
उतर चला सागर के पार
एक मैं माँझी पतवार बहुत हैं
क्या सह पाएगा वह आघात
स्वप्न सजाए खड़ा स्वागत में
राह निहारे जनम जनम तक
घर के छत पर खड़ा सोचे मन
कैसे पहुँचूँ मंजिल तक

खुशियों का अब खिले उपवन
कोई कंठ सुरीला स्वर दे रहा
मंजिल मुझे मिले शायद फिर
है कोई मुझे अपना कह रहा
अब नयनों से कभी बहे नीर ना
खुद का वादा खुद से ही तक
घर के छत पर खड़ा सोचे मन
कैसे पहुँचूँ मंजिल तक

घर के छत पर खड़ा सोचे मन
कैसे पहुँचूँ मंजिल तक
★★★★★★★
डॉ मधुबाला सिन्हा
मोतिहारी,चम्पारण
18 जनवरी 2022

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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