आलेख

नृत्य सम्राट बिरजू महराज


              सुषमा श्रीवास्तव

अभी कल सोमवार दिनाँक 17/01/2022 को यह दुःखद सूचना प्राप्त हुई कि कला जगत की जानी मानी हस्ती नृत्य सम्राट बिरजू महराज नहीं रहे।एकाएक विश्वास करना भी मुश्किल था,पर विधि का विधान कौन टाल सका है! जो आया है वो जाएगा- यह शाश्वत सत्य सबके साथ लागू होता है। हृदय द्रवित हो उठा। उनसे संबंधित बातें और घटनाएँ मन मस्तिष्क में उमड़ – घुमड़कर अपनी जगह बनाने लगीं।
मैं अयोध्या पावन भूमि की तनया उनसे जबतक वहाँ रही प्रतिवर्ष उनसे मिलती और बाल सुलभ बातें करती रही। नृत्य कला से प्रेम तो था ही। अब का पता नहीं पर जबतक वहाँ रहे (1977 तक) अयोध्या छोटे-बड़े  सभी मंदिरों में श्रावण मास की नाग पंचमी से श्रावणी पर्व तक  बड़े बड़े लोक कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम किए जाते थे और आम जनता के लिए निःशुल्क देखने के लिए उपलब्ध होते थे।तब वहाँ  “खाकी का अखाड़ा मंदिर में बिरजू महराज का शास्त्रीय कत्थक नृत्य देखने का सौभाग्य प्रतिवर्ष मिलता था।मैं चंचल स्वभाव वश उनसे बात किए बगैर न रहती। यही कारण है कि इस ख़बर ने मुझे अवरुद्ध कंठ और विगलित हृदय के पाश में ले लिया है।
● जीवन -परिचय  -:
• बिरजू महाराज का जन्म 4 फरवरी 1938 को लखनऊ के ‘कालका-बिन्दादीन घराने’ में हुआ था। बिरजू महाराज का नाम पहले दुखहरण रखा गया था। यह बाद  में बदल कर ‘बृजमोहन नाथ मिश्रा’ हुआ। इनके पिता का नाम जगन्नाथ महाराज था, जो ‘लखनऊ घराने’ से थे और वे अच्छन महाराज के नाम से जाने जाते थे। बिरजू महाराज जिस अस्पताल में पैदा हुए, उस दिन वहां उनके अलावा बाकी सब लड़कियों का जन्म हुआ था, इसी वजह से उनका नाम बृजमोहन रख दिया गया। जो आगे चलकर ‘बिरजू’ और फिर ‘बिरजू महाराज’ हो गया।
पंडित बृजमोहन मिश्र प्रसिद्ध भारतीय कथक नर्तक थे। वे शास्त्रीय कथक नृत्य के लखनऊ कालिका-बिन्दादिन घराने के अग्रणी नर्तक थे। पंडित जी कथक नर्तकों के महाराज परिवार के वंशज थे जिसमें अन्य प्रमुख विभूतियों में इनके दो चाचा व ताऊ, शंभु महाराज एवं लच्छू महाराज; तथा इनके स्वयं के पिता एवं गुरु अच्छन महाराज भी आते हैं। 
• पिता अच्छन महाराज को अपनी गोद में महज तीन साल की उम्र में ही बिरजू की प्रतिभा दिखने लगी थी। इसी को देखते हुए पिता ने बचपन से ही अपने यशस्वी पुत्र को कला दीक्षा देनी शुरू कर दी। किंतु इनके पिता की शीघ्र ही मृत्यु हो जाने के बाद उनके चाचाओं, सुप्रसिद्ध आचार्यों शंभू और लच्छू महाराज ने उन्हें प्रशिक्षित किया। कला के सहारे ही बिरजू महाराज को लक्ष्मी मिलती रही। उनके सिर से पिता का साया उस समय उठा, जब वह महज नौ साल के थे।
बचपन से मिली संगीत व नृत्य की घुट्टी के दम पर बिरजू महाराज ने विभिन्न प्रकार की नृत्यावलियों जैसे गोवर्धन लीला, माखन चोरी, मालती-माधव, कुमार संभव व फाग बहार इत्यादि की रचना की। सत्यजीत राॅय की फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ के लिए भी इन्होंने उच्च कोटि की दो नृत्य नाटिकाएं रचीं। इन्हें ताल वाद्यों की विशिष्ट समझ थी, जैसे तबला, पखावज, ढोलक, नाल और तार वाले वाद्य वायलिन, स्वर मंडल व सितार इत्यादि के सुरों का भी उन्हें गहरा ज्ञान था।
   • 1998 में अवकाश ग्रहण करने से पूर्व पंडित बिरजू महाराज ने संगीत भारती, भारतीय कला केंद्र में अध्यापन किया व दिल्ली में कत्थक केंद्र के प्रभारी भी रहे। इन्होंने हजारों संगीत प्रस्तुतियां देश में देश के बाहर दीं। बिरजू महाराज ने कई प्रतिष्ठित पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त किए। उन्हें प्रतिष्ठित ‘संगीत नाटक अकादमी’ , ‘पद्म विभूषण’ मिला। मध्य प्रदेश सरकार सरकार द्वारा इन्हें ‘कालिदास सम्मान’ से नवाजा गया। 
   • बिरजू महाराज ने मात्र 13 साल की उम्र में ही दिल्ली के संगीत भारती में नृत्य की शिक्षा देना आरम्भ कर दिया था। उसके बाद उन्होंने दिल्ली में ही भारतीय कला केन्द्र में सिखाना आरम्भ किया। कुछ समय बाद इन्होंने कत्थक केन्द्र (संगीत नाटक अकादमी की एक इकाई) में शिक्षण कार्य आरंभ किया। यहां ये संकाय के अध्यक्ष थे तथा निदेशक भी रहे। तत्पश्चात 1998 में इन्होंने वहीं से सेवानिवृत्ति पाई। इसके बाद कलाश्रम नाम से दिल्ली में ही एक नाट्य विद्यालय खोला।
• बिरजू महाराज का भरापूरा परिवार है। उनके पांच बच्चे हैं। इनमें तीन बेटियां और दो बेटे हैं। उनके तीन बच्चे ममता महाराज, दीपक महाराज और जय किशन महाराज भी कथक की दुनिया में नाम रोशन कर रहे हैं। 
• पुरस्कार  -:
    बिरजू महाराज को कई सम्मान व पुरस्कार भी मिले। 1986 में उन्हें पद्म विभूषण से नवाजा गया। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार तथा कालिदास सम्मान प्रमुख हैं। इनके साथ ही इन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं खैरागढ़ विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि मानद मिली। 2016 में हिन्दी फ़िल्म बाजीराव मस्तानी में ‘मोहे रंग दो लाल’ गाने पर नृत्य-निर्देशन के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। 2002 में उन्हें लता मंगेश्कर पुरस्कार से नवाजा गया। 2012 में ‘विश्वरूपम’ के लिए सर्वश्रेष्ठ नृत्य निर्देशन का और 2016 में ‘बाजीराव मस्तानी’ के लिए सर्वश्रेष्ठ नृत्य निर्देशन का फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। 
  • प्रख्यात कथक नर्तक बिरजू महाराज अगले महीने 84 वर्ष के हो जाते, लेकिन रविवार देर रात उनकी सांसें थम गईं। ‘महाराज जी’ के नाम से मशहूर बिरजू महाराज रविवार रात बच्चों के साथ नई दिल्ली स्थित घर में ‘अंताक्षरी’ खेल रहे थे। पोती रागिनी बताती हैं, वह लेटे हुए थे, अचानक उनकी सांसें असामान्य होने लगीं। शायद दिल का दौरा पड़ा था। यह रात 12ः15 से 12ः30 बजे के बीच हुआ।  तुरंत अस्पताल ले गए, लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें बचा नहीं पाए।
 •  टूटे घुंघरू जोड़ने अब महाराज नहीं लौटेंगे नाचते हुए बिरजू कब बिरजू महाराज हो गए, उन्हें भी नहीं पता। नृत्य के आचार्यों ने तो बस यही कहा कि बिरजू महाराज की कला में पिता अच्छन महाराज का संतुलन, चाचा शंभू महाराज का जोश और दूसरे चाचा लच्छू महाराज के लास्य की त्रिवेणी बहती है।दुनिया के हर हिस्से में अपने कथक का प्रदर्शन कर चुके बिरजू महाराज बेहतरीन कोरियोग्राफर रहे और फिल्मी दुनिया ने भी इसे माना। वह कला की दुनिया के उन गिने-चुने लोगों में से थे, जिन्हें लोक तोड़ना अच्छा लगता है। सारे वाद्ययंत्र उनके इशारे समझते थे। गले की मिठास ऐसी कि पनघट भी मुग्ध हो जाए। शायद इसकी वजह यह भी कि पिता अच्छन महाराज की कक्षाओं में बैठ-बैठकर नन्हे से बिरजू ने लय और ताल को मन में उतार लिया था।
• जीवन की पहली कमाई से खरीदी हुई साइकिल रॉबिनहुड की सफाई करते और उसे चमकाकर रखते, खराब होने पर अपनी कार को खुद से ठीक करते, अमिताभ बच्चन के डायलॉग सुनते, गोविंदा का डांस देखते, वहीदा रहमान की अदा पर मुग्ध होते, शिष्यों को बैजयंती माला के नृत्य को देखने की सलाह देते और अपने दादा महाराज बिंदादीन की ठुमरी को गुनगुनाते बिरजू महाराज हमेशा एक सहज जिंदगी जीते हुए दिखे। प्लेट में रबड़ी और कलाकंद देखकर बच्चों की तरह मचलने वाले और अपनी पोती के हाथों से कॉमिक्स लपककर लेने वाले महाराज अपने अंतिम समय तक कथक में नए प्रयोगों के बारे में सोचते रहे। प्रयोग का जो जुनून बचपन में शुरू हुआ था, वह जारी रहा। उन्होंने न तो अपनी जिंदगी में किसी कंफ्यूजन की बात स्वीकार की और न ही कभी फ्यूजन की बात मानी। हमेशा कहते रहे, सड़क कोई भी हो, चलेगा तो बिरजू ही। लेकिन हर किसी की जिंदगी में एक सड़क ऐसी भी आती है, जिसमें यू-टर्न नहीं होता। आगे ही बढ़ना होता है.. बहुत आगे, जहां से कोई नहीं लौटता।
नृत्य करते समय उनकी भाव भंगिमाएं ,चेहरे के एक्सप्रेशन,और बोलती हुई आँखे बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेतीं। नृत्य की यह विशेषता मैंने उन्हें देखते हुए ही सीखी और अनुभव की।
    अब तो हम हाँथ जोड़कर बस यही प्रार्थना कर सकते हैं कि ईश्वर उनकी आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दे तथा समग्र देश और उनके परिवार को इस अपूरणीय क्षति को सहन करने की शक्ति एवं धैर्य प्रदान करे। ॐ शांति शांति!


          लेखिका –
              सुषमा श्रीवास्तव
                  उत्तराखंड।

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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