आलेख

बदलते परिवेश में समता- समानता मूलक राजनीति की जरूरत है

गणेश दत्त शर्मा

संविधान लागू होने के साथ,देश में संवैधानिक दायरे में शासन व्यवस्था कायम हुई । स्वतंत्रता के समय माना गया , समाज के कुछ कमजोर, पिछडे वर्ग हैं,जिन्हे सहयोग की जरूरत है । राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत भारतीय जनता जो तात्कालिक नेताओं की भूमिका का सम्मान करती थी, उनके इस विचार और उनके द्वारा प्रस्तुत व्यवस्था को स्वीकार कर लिया गया।
देश की व्यवस्था समय के साथ संविधान के दायरे में संचालित होती रही । वोटों के माध्यम से देश के विकास की जिम्मेदारी निभाने वाली नेतृत्व भावना कब सिर्फ सत्ता सुख भोगने का औज़ार बन गई, विभेद करना थोड़ा मुश्किल है । सत्ता सुख की चाहत का दुखद पहलू ही है, की बिना राष्ट्रीय एकता, लोकतंत्र की मजबूती की परवाह किए सिर्फ वोटों के धूर्तता पूर्ण, ध्रुवीकरण की निरंतर कोशिश होती रही है । बडा सियासी फंदा धर्म के नाम पर मतदाताओं के गले में लटका ही रहता है । जिसके चलते धार्मिक टकराहट का वातावरण बना रहता है ।
वोटों के लिए ही बहुसंख्यक हिंदूओं के बीच ‘अलगाव’ की कोशिश राजनीतिक कुटिलता से होती रही है । अगडे-पिछडे, सवर्ण -दलित, भारतीय मूल निवासी -विदेशी, भगवान -भीम जैसे तमाम छिछोरे नारे, उलजलूल विचारधारा का प्रचार,प्रसार करने में बहुत से लोग लगे रहते हैं, जिनके पीछे का राजनीतिक चेहरा छुपा भी नहीं है । कमोबेश कोई भी राजनितिक दल इससे पृथक दिखाई भी नहीं पडता ।
गौरतलब है की वर्तमान आर्थिक,व्यावसायिक,सामाजिक परिदृश्य वैश्विक बदलाव के साथ साफ दिखाई देता है । तमाम सार्वजनिक व्यवस्थाओं जैसे बस/रेल/जहाज आदी यातायात के साधन हर धर्म, जाति, फिरका, कास्ट के लिए समान रूप से उपलब्ध हैं, इनमें यात्रा और माल की ढुलाई भी बिना किसी असमानता के निर्बाध रूप से हो रही है । होटल, रेस्तरां, बार, हास्पिटल, वाटरपार्क, डिस्को थिएट, पिक्चर हॉल, पुस्तकालय, ऐतिहासिक स्थल जैसे कुतुब मीनार, ताजमहल, गोलकुंडा, ऐलिफेंटा -अजन्ता -ऐलोरा की गुफाऐं, तारागढ आदी तमाम जगहों पर बिना जाती -धर्म पूछे हर भारतीय नागरिक समान रूप से प्रवेश पा रहा है ।
बाजार में दुकान मालिक -किरायेदार, दुकानदार, नौकर, ग्रहक आदी सभी को सभी जातियों, फिरकों, धर्म,मजहब के लोग पूरे देश में एक दूसरे के साथ मिलकर कमाने-खाने में लगे हैं । बडे मॉल में घुसलखाना साफ करने से लेकर शोरुम के मालिक तक हर फिरके, धर्म का व्यक्ति मिलता है । यह सब कुछ लोगों की आपसी जरूरत, जिम्मेदारी के अहसास का ही परिणाम है । ध्यान रखने वाली बात है, लोग यहां बिना किसी सरकारी तामझाम, आदेश या किसी तरह के विशेष संरक्षण के (टैक्स, कानूनी व्यवस्था की जरूरत के अलावा) अपनी दिनचर्या के साथ जीवन यापन में पूरी शिद्दत से लगे रहते हैं । (राजनीतिक हथकंडे के तौर पर धार्मिक व जातीय वैमनस्य जनित घटनाओं के अलावा)
और तो और सभी धर्मो के धर्म स्थलों पर परस्पर दूसरे धर्म के लोग थोड़ा बहुत नहीं बडी संख्या में आते हैं, उदाहरण के लिए गोवर्धन की परिक्रमा,मथुरा-वृंदावन सहित देश के बड़े मंदिर जैसे इस्कॉन,स्वामी नारायण मंदिर या फिर अजमेर की दरगाह,दिल्ली की जामा मस्जिद हो या फिर छोटी छोटी जगहों पर प्रेत-पठान के चबूतरे हों हर जगह बहुत से मुस्लिम मंदिर में नजर आते हैं, बहुत से हिंदू मस्जिद में नजर आते हैं । वैसे ही इसाई मंदिर -मस्जिद में व हिंदू -मुस्लिम चर्च में दिखाई पडते हैं । हां कुछ मस्जिदों -मंदिरों-गिरजाघरों की परंपरा या व्यवस्थागत जरूरत लोगों को कुछ नियमों में जरूर बांधती है, जिनका सामान्यतः सभी सम्मान करते हैं। हो सकता है इन सभी जगहों पर कुछ बातें अव्यवहारिक लगती हों या उचित नहीं लगती हों, उनमें सुधार इतना मुश्किल भी नहीं लगता । हालांकि समय समय पर परिस्थिति जन्य बदलाव हर धार्मिक व्यवस्था में हुए हो सकते हैं और भी बदलाव की जरूरत हो सकती है। इन बदलावों के लिए धार्मिक -सामाजिक चर्चाऐं होनी चाहिए, ना की राजनीतिक कुटिलता से धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों व आस्था को लहूलुहान किया जाना चाहिए, लेकिन राजनीतिक कुश्चेष्टा समाधान से ज्यादा जन भावनाओं से खिलवाड़ करना पसंद करती है । कमजोर व जरूरत मंद को सहयोग के नाम पर दी जाने वाली व्यवस्था जो एक तरफ सरकारी प्रमाण पत्र के माध्यम से व्यक्ति के धर्म व जाती के निर्णय को पुष्ट करती है, ऐसे प्रमाण पत्र धारी को जिसकी जाती -धर्म साफ साफ रूप से सरकारी आदेश द्वारा सरकार स्वीकार करती है,इसलिए भारतीय नागरिक उस सरकारी आदेश को मानने के लिए स्वतः बाध्य हैं, तो फिर कैसे इस सरकार के प्रमाणपत्र में लिखी जाती को नकारा जा सकता है। यदि अधिकारी नकारता है, तो क्या यह सरकार के आदेश का उलंघन माना जायेगा ।
जब सात दशकों सेभी अधिक समय से देश में लोकतंत्र की व्यवस्था है, शासन का संचालन संविधान के अनुसार हो रहा है, तो इसका मतलब है , कोई किसी का शोषण नहीं कर सकता, यदि कोई ऐसा करता है तो उसे कानून सजा देने की ताकत रखता है ।
गौर करने वाली बात यह भी है की 70 वर्ष पहले जन्में ज्यादातर भारतीय या तो इस जगत को छोड चुके हैं या फिर वे शारीरिक रूप से अशक्त हो चुके हैं या फिर इनमें से गिनती के कुछ लोग अभी भी सक्रिय हैं। स्वतंत्रता से वर्तमान तक लगभग तीन से चार पीढियों का समागम हर समाज साफ साफ नजर आता है ।
तमाम व्यवस्थाओं ,संसाधनों, नियमों के बावजूद देश में एक तरफ अमीर बढ रहे हैं तो दूसरी ओर गरीब और गरीब होते जा रहे हैं । यह अमीरी व गरीबी सभी धर्मों व फिरकों में साफ दिखाई देती है । यदि केवल कानूनी संरक्षण प्राप्त परिवारों की बात करें तो वहां भी अमीर व गरीब का अंतर अन्य परिवारों के बीच अंतर जैसा ही दिखाई पडता है। जिसका विस्तार सभी धार्मिक मान्यता वालों तक है ।
इन सबके बीच यह तय है ,की वर्तमान लोकतंत्र में किसी भी ‘जाती,फिरके या धर्म ‘ द्वारा किसी भी ‘जाती,फिरके या धर्म ‘ का शोषण करना सैद्धांतिक तौर पर संभव नहीं है । (कहीं कुछ ऐसा हुआ है या होता है ,तो उसके पिछे धर्म और जाति से ज्यादा राजनीतिक कुटिलता नजर आयेगी ।)

लोकतंत्र की मजबूती के लिए संविधान की मूल भावना का सम्मान करते हुए ,’समता -समानता ‘ को मात्र नारा मानने से आगे बढकर व्यवहार रूप में इस पर ठोस व्यवस्था बनाने की जरूरत है । जिसमें सबसे पहले सरकार द्वारा बिना किसी भेदभाव को बढ़ावा देने वाले विचारों को मजबूती देने के लिए देश के नागरिक के रूप में व्यक्ति को केंद्र में रखकर, मानव कल्याण की भावना को पुष्ट करने वाली व्यवहारिक व्यवस्था को मजबूत बनाने का प्रयास करना होगा ।
देश में लोकतंत्र की व्यवस्था में हर व्यक्ति को जन्म से मृत्यु पर्यंत तक जीवन, सुरक्षा, विकास आदि मानवीय जरूरत के समान व सम्मान जनक अवसर उपलब्ध कराने होंगे । मनुष्य-मनुष्य के बीच किसी भी प्रकार के भेदभाव को कठोरता से नकारना होगा ।
जब राजनीति का आधार समाज की जरूरतों व क्षमताओं पर आधारित होगा, तो समता ,समामता के विचार पर प्रभावी व व्यवहारिक जोर स्वतः आयेगा । इस तरह हम लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूती प्रदान कर रहे होंगे ।
सभी को समान अवसरों की बात की जाती है तो यह विचार बिना भेद के हर व्यक्ति के संदर्भ में होना चाहिए ताकी सिद्धांततः ‘समता-समानता’ के विचार को आधार बनाकर योजनाओं का निर्धारण व क्रियान्वयन होता रहेगा । व्यक्तिगत स्वतंत्रता व मानवाधिकार के विचारों के साथ योजना बनाई जाएगी तो निश्चित रूप से व्यक्तिगत व सामाजिक विकास पर आधारित राजनैतिक व्यवहार दृष्टीगोचर होगा ।

गणेश दत्त शर्मा
(राजस्थान )

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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