राजनीति

आओ दिये जलाएं

डॉ वीना गर्ग

रचनाकार-डा.वीना गर्ग
अन्धकार है आज बहुत
आओ हम दिये जलाएं
बुझते मन में नवप्रकाश की
कुछ किरणें बिखराएं।
खुशियों से हैं दूर यहाँ
कुछ जन उदास हैं
उनके प्यारे आज नहीं
ना तो हुलास है
हर्षित करने उन्हें चलो
कुछ क़दम बढ़ाएं
आओ दिये जलाएं।
हँसते जीवन-दीप बुझे
इस साल अचानक
आँधी आई मुश्किल भी
थी बहुत भयानक
टूटी हिम्मत वाले जो
थक कर बैठे हैं
आओ उनका हाथ थाम
कुछ धीर बँधाएं
आओ दिये जलाएं।
ना रोटी ना कपड़ा
ना कोई बिस्तर है
जो निर्धन हैं फुटपाथ
पर जिनके घर हैं
उनके संग खड़े होकर
कुछ पल मुस्काएं
आओ दिये जलाएं।
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित।
डॉ वीना गर्ग मुजफ्फरनगर

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