ग्राम टुडे ख़ास

अखरता है घर बैठना

राकेश चन्द्रा

बच्चों की छुट्टियाँ हों या बड़ों के सार्वजनिक अवकाश, दोनों ही स्थितियों में प्रायः घर में बैठना सजा-समान प्रतीत होता है। आखिरकार मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में रहकर एक ही परिवेश में जड़वत होना किसी भी दृष्टि से स्वास्थ्यकर नहीं है। घर से बाहर निकलना और समाज की मुख्य धारा में शामिल होकर आगे बढ़ना मनुष्य के आत्मविश्वास को बढ़ाता है। अक्सर बाहर निकलने का अभिप्रायः पार्क, ऐतिहासिक स्थल, संग्रहालय, कला वीथिका आदि के भ्रमण से ही होता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस श्रृंखला में मॉल एवं फूडं ज्वाइंट्स भी जुड़ गये हैं। इनमें से पार्कों एवं ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण न केवल प्रकृति एवं पर्यावरण से वरन अपनी धरोहर से भी हमको जोड़ता है। छोटे बच्चों के लिए तो पार्कों का भ्रमण संभवतः सर्वाधिक आनंददायक है। उन्हें दौड़ भाग, धींगामुश्ती करते देख उनके अभिभावकों में भी प्रसन्नता का संचार होता है। इसी प्रकार, ऐतिहासिक स्थलों में भी पर्यटक काफी संख्या में आते रहते हैं पर यदि हम सायंकाल इन स्थानों पर जाकर देखें तो जगह-जगह गंदगी बिखरी मिलेगी। पॉलीथीन के खाली पैकेट, कागज के टुकड़े, प्लास्टिक की बोतलें एवं कप जैसी कितनी सामग्री पूरे परिसर में बिखरी दिखाई देगी। इसके अतिरिक्त इन परिसरों के किसी कोने में अकसर लघुशंका करते लोग दिखाई देंगे। इसकी एक वजह तो यह बतायी जा सकती है कि ऐसे स्थलों या परिसरों में कूड़ेदान तथा शौचालयों का न होना है। जहाँ शौचालय हैं भी तो अकसर गंदे रहते हैं। मान लीजिए कि कूड़ेदान नहीं हैं तो भी हम प्रयोग में लाई वस्तुओं को इधर-उधर फेंकने के बजाय एक बड़ी पालीथीन या कागज के थैले में भरकर एक स्थान पर रख सकते हैं। अगले दिन सफाई करते समय ऐसे थैलों को समेटना अपेक्षाकृत आसान होगा और परिसर की साफ-सफाई भी बनी रहेगी। इसी प्रकार यदि परिसर में शौचालय की व्यवस्था नहीं है या शौचालय प्रयोग लायक नहीं हैं तो यथासंभव आसपास के क्षेत्र में यदि सुविधा उपलब्ध है तो उसका प्रयोग किया जाना श्रेयस्कर होगा। वैसे ऐसे परिसरों यथा सार्वजनिक पार्क, उद्यान तथा ऐतिहासिक स्थलों में कूड़ेदान एवं शौचालय की व्यवस्था का जिम्मा तमाम सार्वजनिक प्रतिष्ठानों जैसे बैंक, वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों को भी सौंपा जा सकता है। कारपोरेट सोशल रेस्पान्सिबिलिटी की अवधारणा को पूर्ण करने के दृष्टिगत यह छोटा सा प्रयास न केवल स्वच्छता बल्कि पर्यावरण की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होगा। हर छोटे बड़े शहर में ऐसे प्रतिष्ठान कार्यरत हैं। अच्छा होगा कि अपने दायित्व को समझते हुए वे स्वयं आगे आयें और स्वस्थ एवं सुंदर समाज की संरचना में अपना अमूल्य योगदान प्रदान करें। यहां एक बात और है- अकसर यह देखा जाता है कि हम लोगों में भी साफ-सफाई एवं पर्यावरण के प्रति जो स्वस्थ दृष्टिकोण होना चाहिए वह अपेक्षित स्तर तक दृष्टिगोचर नहीं होता। आगंतुकों एवं पर्यटकों का ध्यान इस ओर आकर्षित करने के लिए समय-समय पर भारत स्काउट एवं गाईड के कैडेट्स तथा एनएसएस योजना के विद्यार्थियों का सहयोग लिया जाए जो माह में एक दिन किसी पार्क या ऐतिहासिक  स्थल पर जाकर आने-जाने वालों के लिए मार्गदर्शन का काम करें। उनके लिए भी फील्ड का यह अनुभव उन्हें निःसंदेह समृद्ध बनाएगा। निःसंदेह समाज के सभी वर्गों के सहयोग से ही नकारात्मक प्रवृत्तियों को समाप्त किया जा सकता है।  

राकेश चन्द्रा
610/60, केशव नगर कालोनी

सीतापुर रोड, लखनऊ

उत्तर-प्रदेश-226020

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