ग्राम टुडे ख़ास

अधूरी कहानी

( लघुकथा )

राजीव भारती

अत्यंत ही भाग्यशाली होते हैं वे लोग जिनकी जिंदगी की कहानी एक मुकाम पर पहुंच पाती है, अन्यथा जीवन की कहानी एक अधूरी कहानी बनकर रह जाती है।स्नेहा और विपुल दोनों बचपन के दोस्त थे। एक ही मुहल्ले में घर होने के कारण दोनों में प्रगाढ़ दोस्ती थी। मज़े की बात,कि दोनों एक ही कक्षा में पढते थे इसलिए उनमें आपस में अत्यंत घनिष्ठता थी,एक परिवार के सदस्य की तरह।दिन कब पंख लगाकर उड़ गए कि दोनों को पता ही नहीं चला।अब दोनों युवा हो चुके थे।विपुल विज्ञान संकाय में अध्ययनरत था जबकि स्नेहा कला संकाय में । उच्च अध्ययन हेतु विपुल को मुंबई जाना पड़ा और स्नेहा अपने शहर मोतिहारी के ही एक महाविद्यालय में पढ़ने लगी। स्नेहा के पिता की आर्थिक स्थिति कुछ अच्छी नहीं थी, अतः उच्च शिक्षा हेतु उसे अन्यत्र नहीं भेज सकते थे। स्नेहा की आकांक्षा थी कि वह आई .ए .एस की तैयारी के लिए किसी अच्छे कोचिंग संस्थान में दाखिला ले पर वह विवश थी। विपुल के मुंबई चले जाने से बहुत उदास रहने लगी थी, क्योंकि न जाने वह मन ही मन कब उसके प्रेमपाश में बंध गईं थीं।
विपुल भी मन ही मन स्नेहा को बहुत चाहता था।दिन यूं ही बीतते गए। स्नेहा के पिता रामाधार जी की तबीयत कुछ बिगड़ने लगी थी, हृदय रोग से ग्रस्त हो गये थे और अस्वस्थ होने की वजह से उन्होंने स्नेहा की शादी का जल्दबाजी में निर्णय लिया और शहर से ही थोड़ी दूर एक गांव में अभिजीत नाम के एक लड़के से उसकी शादी कर दी । लोकलाज और पिता के बिगड़ते स्वास्थ्य को देखते हुए स्नेहा मौन रही और इस रिश्ते को स्वीकृति दे दी। एक माह बाद ही दोनों परिणय सूत्र में बंध गए और स्नेहा अभिजीत की हो गई। इधर विपुल दो वर्षों बाद अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद घर आया था घर वालों से मिलने के लिए क्योंकि उसे शीघ्र ही एक अच्छी कंपनी में कार्यभार ग्रहण करने हेतु लौटना भी था। वह स्नेहा से मिलने को बहुत आतुर था, किन्तु जब वह उसके घर गया तो स्नेहा की शादी की खबर जानकर सुन्न रह गया।वह किसी से कुछ नहीं बोला और उल्टे पांव घर लौट आया। घर आकर बिस्तर पर औंधे मुंह चुपचाप लेट गया और सिसक सिसक कर रोने लगा,बस यही सोचकर कि उसकी जिंदगी एक ” अधूरी कहानी ” बनकर रह गयी।

राजीव भारती
पटना बिहार (गृह नगर)

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