ग्राम टुडे ख़ास

आओं सहेजें पर्यावरण

मनु प्रताप सिंह चींचडौली

संरक्षण हैं अत्यावश्यक,
आओं,सहेजें पर्यावरण।
वृक्ष-रोपण पूण्य कर्म से,
दृढ़ प्रण करो धारण।।

जीवन की पूँजी को,
हे!मानव ऐसे न गँवाओ।
सनातन को स्मरण कर,
पुनः प्रकृति को सजाओं।।

प्रकृति की प्रचण्ड शक्ति के,
समक्ष मानव शीश झुकाओं।
धरती को ही जलाकर तुम,
ख़ुद की संपत्ति मत जलाओ।।

विकास पुरुष के बजाय,
हैं पर्यावरण मित्र की दरकार।
जब जिएगी तेरी पीढ़ी नरक में,
करेंगी बारम्बार तुझे धिक्कार।।

स्वर्ग धरा बनेगी यह तब,
जल-वायु-मिट्टी- होंगी शुद्ध।
वरन वह दिवस अधिक दूर नहीं,
जब प्रलयकारी प्रकृति होंगी क्रुद्ध।।

विकास की बर्बादी में क्यों,
कटते-बहते वृक्ष-जल अकारण।
संरक्षण हैं अत्यावश्यक,
आओं,सहेजें पर्यावरण।

मनु प्रताप सिंह चींचडौली (काव्यमित्र)

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