ग्राम टुडे ख़ास

आम्रपाली की व्यथा

सवि शर्मा
प्रेम किस रूप में परिभाषित होगा
सुगंद की बयार फैलाता
क्या सम्भव है इस पंचतत्व
की ख़ूबसूरती महसूस करता
गहराई से
वीभत्स तैरती आँखो में
कामांध की चिंगारियाँ ना उठे
गहन पीड़ा को जन्म दिय
बग़ैर स्निधता व्याप्त होती
पावन सी
बुनती प्रेम के अनगिनत दुशाले
तृप्ति में डूबा आकंठ
सुखद अनुभूति में लीन हो जाता
पर नही
देख अप्रतिम सौंदर्य नही
सम्भाल पाता देह पिपासा
उस अनाथ आम्रपाली को
बिठा दिया बना नगर वधू
ताकि पा सके हर कोई
एक छिछली कामोद्दीप
अनुभूति
निरपराध देह को भोगते
मनमानी
बना था सौंदर्य अभिशाप
और उसे वेश्या बना किया था
तृप्त खुद को
किसने हक़ दिया था एक नारी की
अस्मिता को चिथड़े
करने का अधिकार
कौन है अपराधी
आम्र पाली का ?
कौन था चरित्र हीन?
एक पूरा समाज
जिसकी सोची समझी साज़िश
थी
उसका अपराध सुंदर होना था
या फिर अनाथ
क्यूँ मौन रह गया सम्पूर्ण स्त्री
समाज ?
नही रोक पाया पुरुषत्व
के अहंकार को
दिगदिगान्तर तक तैरता रहेगा
ये सवाल
देवदासी प्रथा क्या समाप्त हो गई ?
आज आम्रपाली कही नही दिखती
क्या आज कोई बुद्ध फिर आएँगे ?
सबकी पीठ पर तैर रहे हैं ये सवाल
एक चाबुक बन प्रहार कर रहे हैं

सवि शर्मा
देहरादून

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