ग्राम टुडे ख़ास

उड़ने का मन करता है

अनुपम चतुर्वेदी

दूर गगन में पर फैलाए ,
उड़ने का मन करता है।
ऊपर से कैसी?लगती है धरती,
उसे निरखने का मन करता है।
अन्दर-अन्दर अंधियारा है,
बाहर – बाहर उजियारा ।
इस बहुरंगी दुनिया से ,
पार निकलने का मन करता है।
पीर हिया की किसे? बताऊं,
क्या है झूठ,और सच क्या?है
यह कैसे?सबको समझाऊं।
इस स्वांग रचाए दुनिया से,
विलगित होने का मन करता है।
नट सा नाच-नाच कर ,
कब तक ? मन बहलायेगा।
बहुरूपिया बन कर कितने दिन,
अपना रूप छिपायेगा ।
इस रंग बदलती तस्वीरों को,
मन से बाहर करने का मन करता है।
अन्धकार मन के अन्दर का,
कैसे?दूर करूं साथी ।
प्रकाश प्रसारित हो रोम-रोम में,
कैसे ?यत्न करूं साथी।
मन्द-मन्द मुस्कान अधरों पर सबके,
प्रफुस्ठित करने का मन करता है।
दूर गगन में पर फैलाए,
उड़ने का मन करता है।

अनुपम चतुर्वेदी

सन्त कबीर नगर, उ०प्र०

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