ग्राम टुडे ख़ास

ऋषि तिवारी ज्योति की कलम से

सिया की खोज

लखन देखत हैं व्याकुलता,
भ्राता राम की छूप ।
फिर भी मन मुस्कान से,
देखत हैं सिय भूप ।।

वर्षा ऋतु गयो लागत है,
फूटे कास चहूंओर ।
सिया मिलन की आस अब,
निकट यथा हो भोर ।।

लखन कहत श्री राम से,
करो ना भैया देर ।
खोजन चलो सिय माता को,
कहीं न होवै देर ।।

यहीं समय तो बोला था,
महाराज सुग्रीव ।
वचन भूल तो गयो नहीं,
वानर राज सुग्रीव ।।

क्रोधित लखन चले महल,
आज्ञा से श्री राम।
धीर धैर्य से हे अनुज ,
वचन दिलाना याद ।।

आग बबूला लखन लाल,
पहुंचे वानर दरबार ।
धमक धमक सुग्रीव की,
वचन दिलाई याद ।।

सुग्रीव जोड़े कर लखन को,
भैया क्रोधित मत होंहू ।
इसी समय चहूंदिश में,
सैनिक सब भेजहुं ।।

वानर संग भालू चले,
अपने अपने ओर ।
टोली जिसमें बजरंग थे,
चला दक्षिण की ओर ।।

चला दक्षिण की ओर ।।

बदलाव

समय भी बदला,
सत्ता बदली ,
बदल रहा ,
जीने का ढंग ।
बर्तन बदले,
भोजन बदला,
बदल रहा,
खाने का ढंग ।

तौर तरीके,
बदल गए हैं,
बदल गया,
चेहरे का रंग ।
बिस्तर बदला,
खाट बदल गए,
बदल गया,
सोने का ढंग ।

चाॅक भी बदला,
कलम भी बदले,
बदल गया,
श्यामपट रंग ।
शिक्षक बदले,
गुरुकुल बदला,
बदल गया,
शिक्षा का ढंग ।

नारी बदली,
यारी बदली,
बदल पोशाक,
हो गया बेढंग ।
कर्म बदल गए,
धर्म बदल गए,
बदला पुरुष,
समाज का संग ।

मुद्दा बदला,
मुद्रा बदला,
ताज तख्त का,
बदला रंग ।
कुर्सी बदली,
जर्सी बदला,
ध्वजा बदल कर,
हुआ तिरंग ।

मार भी बदला,
हथियार भी बदला,
बदल गया,
युद्धों का ढंग ।
योद्धा बदले,
सैनिक बदले,
बदल गया,
तरीका जंग ।

बहते जाओ नदियों सा


जो राह तुझे भी पाना है गर,
लक्ष्य का अपने जीवन में,
तो झील के जैसे मत ठहरो,
तुम बहते जाओ नदियों सा ।

कदम निरंतर बढ़ता है जो,
वहीं कदम बढ़ जाता है ,
पोखर जैसा मत बनना,
तुम बहते जाओ नदियों सा ।

बढना गर लगता है मुश्किल,
ढाल जिधर हो बह जाओ,
राह के रोड़े तोड़ के तुम भी,
बहते जाओ नदियों सा ।

राह नदी के भी आते हैं,
बड़े बड़े चट्टानें भी,
फिर राह बना लेती है,
कदम बढ़ाओ नदियों सा ।

मोड़ भी कितने होते हैं,
जो कठिन राह की है पहचान,
जैसे नदियां रूकी नहीं,
तुम बहते जाओ नदियों सा ।

ॐ नमः शिवाय

घर बैठे सब कहते रहते,
बम बम डमरू वाला ।
ॐ नमः शिवाय का जपते,
संकट में सब माला ।

रिमझिम रिमझिम बारिश लेकर,
देखो सावन आया ।
बम बम अवघड़दानी को,
यहीं महीना भाया ।

प्रथा चला है हर तरफ,
सिर्फ और सिर्फ महाकाल का ।
जिधर भी देखो मिल जाएंगे,
भक्त बहुत महाकाल का ।

हर हर गंगे बोल रहा है,
माटी हिन्दुस्तान का ।
जिधर भी देखो मिल जाएंगे,
भक्त बहुत महाकाल का।

तीन पात का विल्व पत्र जो,
प्रिय है भोले शंकर को ।
भांग धतूरा भी है पसंद है,
मेरे भोले शंकर को ।

ॐ नमः शिवाय ,
ॐ नमः शिवाय ।

मैं गजल लिख रहा हूं

मैं ग़ज़ल लिख रहा हूं ,
तेरे साथ चलते चलते ।
कहीं शाम हो ना जाए,
तेरे साथ चलते चलते ।।

यह जिंदगी भी दिन है,
जो है अभी सबेरा ।
लिख लो अभी जो लिख सको,
मेरे यार चलते चलते ।

न मिला है वक्त खुद से,
उसे ढूंढना है पड़ता ।
कहीं वक्त निकल न जाए,
मेरे यार चलते चलते ।

जब जिंदगी का सूरज,
सर पे अगर आ जाए ।
तो समझना मेरे यार ,
यह राज चलते चलते ।

शौक है साथ तेरे,
कुछ पल हीं बैठने की ।
आ बैठ लें अभी ,
मेरे यार चलते चलते ।

मैं ग़ज़ल लिख रहा हूं ,
तेरे साथ चलते चलते ।
कहीं शाम हो ना जाए,
तेरे साथ चलते चलते ।।

✍️ ऋषि तिवारी ज्योति
चकरी, दरौली, सिवान ( बिहार)

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