ग्राम टुडे ख़ास

एक मज़दूर की व्यथा

रेखा रानी

मेरे पास निबाला नहीं, पैसे का कहीं न पता ।
महामारी से पहले ही, सांसें देती हैं दगा।
परिवार मेरा सारा ,भुखमरी की भेंट चढ़ा।
जग कहता है सारा, कोरोना है बहुत बढ़ा।
मैं दोष किसे दूं अब किस्मत के हाथों ठगा।
महामारी से पहले ही,सांसें देती हैं दगा।
रोजी छीनी मेरी, माना महामारी ने।
न हाथ फैलाने दिया, मेरी खुद्दारी ने।
सब स्वार्थ के हैं नाते, कोई मेरा न सगा।
महामारी से पहले ही सांसें देती हैं दगा।
झूठी इस दुनिया में मतलब के सभी रिश्ते।
सुख में सब साथ चले, दुःख में हैं सभी बचते।
रेखा है न अब बाकी दुनिया में कहीं बफ़ा।
महामारी से पहले ही सांसें देती हैं दगा।
मेरे पास निबाला नहीं , पैसे का कहीं न पता।

रेखा रानी
विजयनगर गजरौला,
जनपद अमरोहा,
उत्तर प्रदेश।

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