ग्राम टुडे ख़ास

एक मां की व्यथाा

अपनी व्यथा मैनें गुलाब की कली के माध्यम से प्रस्तुत की है
गुलाब की कली मतलब बेटी

नमिता (स्मृति) मिश्रा

ऐ मेरी गुलाब की कली,
तू खिलना मत
गर तू खिलेगी तो
महफूज न रहेगी।
***””
न जाने कब कोई भँवरा आकर
रौंद देगा तेरे अस्तित्व को
या फिर कोई माली तोड़कर
चढ़ा देगा भेंट तुझे
किसी और की जागीर बना
ऐ मेरी गुलाब की कली
तू खिलना मत।
****”
देखकर तेरी सुकोमल सी हँसी
ये दुनिया बेरहम, बेसाख्ता जलेगी
तेरे मासूम लबों पर देख मुस्कुराहट
न जाने कितने फिकरे कसेगी
ऐ मेरी गुलाब की कली
तू खिलना मत।


तोड़कर डाल से तुझे
कर देंगे जुदा मिलकर सब
फिर बिखेरकर पंखुड़ियाँ
मिटा देंगे अस्तित्व जब
तू महफूज है अपने
पत्तों के गर्भ में ही
गर्भ तोड़कर कभी
बाहर आना मत
ऐ मेरी गुलाब की कली
तू खिलना मत।

***”
नमिता (स्मृति) मिश्रा
रुगुरी पारा
बलांगीर
ओडिशा

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