ग्राम टुडे ख़ास

एक राह ऐसी भी

कहानी

गिरिराज पांडे

घर परिवार समाज एवं अपने विभाग से अपमानित मूर्ख पागल एवं हरिश्चंद्र का चेला जैसी उपाधि प्राप्त कर चुके इंस्पेक्टर साहब के चेहरे पर आज खुशी की लहर दौड़ पड़ी है
चमकता हुआ ओजस्वी चेहरा होठों पर मंद मंद मुस्कुराहट गर्व से चौड़ा हुआ सीना सुडौल शरीर पर वर्दी उसके ऊपर कंधे पर
लगा चमकता हुआ स्टार कमर से बंधे बेल्ट में लगी रिवाल्वर कत्थे रंग का रूल सिर पर लगा हैट उससे भी कहीं ज्यादा सुडौल शरीर पर ईमानदारी का रूआब देखते ही बनता था
मां के द्वारा दी गई ईमानदारी एवं संस्कारित शिक्षा का प्रभाव इंस्पेक्टर साहब के मन इस प्रकार से घर बना लिया कि वह गलत कार्य करना तो दूर गलत सोच भी नहीं सकते थे वह कठिन से कठिन परिस्थिति में डगमगाते नहीं थे वह अपनी ईमानदारी जिम्मेदारी एवं नैतिक मूल्यों को ध्यान में रखकर बड़ी ही कठिनाइयों के साथ अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे थे जहां आज चारों तरफ बेईमानों का बोलबाला हो वहां एक आध ईमानदार की हैसियत क्या वह भी पुलिस विभाग में जहां पर सिर्फ चोरों का ही दरबार चलता हो जहां नीचे से लेकर ऊपर तक सभी के सभी रिश्वत के खेल में सने हुए हो
अपने कड़क स्वभाव ईमानदारी जिम्मेदारी के प्रति दृढ़ संकल्प लिए इंस्पेक्टर साहब जहां भी जाते पूरा का पूरा पुलिस स्टेशन उनके कड़े निर्देशों से सहम सा उठता था कायर एवं रिश्वतखोर किस्म के पुलिस वालों के ऊपर तो शामत आ जाती थी पूरे क्षेत्र में इनकी ईमानदारी की चर्चा आम हो गई थी पूरे क्षेत्र की सम्मानित जनता इन को भगवान मानने लगी थी वह ना गलत काम करते और ना ही करने देते आज अपराधी क्षेत्र छोड़कर भाग रहे हैं लेकिन कुछ राजनीतिक अपराधी इस ईमानदार छवि वाले इंस्पेक्टर के व्यवहार से संतुष्ट नहीं हैं अतः वह इनका ट्रांसफर कराने की जुगत में लग जाते जिससे इनका ट्रांसफर एक स्थान से दूसरे स्थान पर होता रहता था जिसके कारण वह अपने पूरे सेवाकाल में अपना परिवार साथ में नहीं रख सके दो बच्चे थे जिनकी पढ़ाई गांव में चल रही थी घर के नाम पर वही पैतृक कच्चा मकान जिसकी रंगाई पुताई ही इस जीवन में करा पाए थे किसी भी प्रकार की चल अचल संपत्ति नहीं खरीदी जिसके कारण लोग इनकी नौकरी पद पर भी व्यंग्यात्मक प्रश्नचिन्ह लगाते थे
जब भी वह घर आते तो मिठाई के नाम पर बताशा लाते थे कभी-कभी पत्नी भी खूब खरी-खोटी सुनाती थी बगल में मिश्रा जी हैं जो एक सामान्य सिपाही है उनका घर देखो कितना सुंदर बना है दूसरी गाड़ी भी ले लिए आपके पास न घ घर न गाड़ी बनते हो पुलिस के बड़े साहब वह मुस्कुराते हुए कहने लगते धैर्य रखो सब हो जाएगा इतना बड़ा घर बनवाऊंगा कि लोग देखते रह जाएंगे
पता नहीं कब होगा पत्नी भुनगुनाते हुए बोली
वह दोनों बच्चों को पास बुलाकर एक एक बताशा मुंह में डालते हुए पूछते हैं मीठा है जोर से आवाज आती है हां पत्नी सहित बताशा खाते हुए हंसने लगते हैं जिससे पूरे घर में खुशी का माहौल छा जाता है आज बताशे की मिठास के आगे मिठाई भी लज्जित सी हो गई
शासन से लेकर प्रशासन तक हमेशा उन्हें ईमानदारी की सजा मिली जब भी वह अधिकारी के पास जाते तो खाली हाथ क्यों की वे स्वाभिमानी थे किसी से पैसा लेते ही नहीं थे तो दे कहां से अन्य सभी इंस्पेक्टर पूरा पैसा लेकर आते थे जितनी अधिकारी की मांग होती थी
पैसा ना दे पाने के कारण इनके ऊपर डांट पड़ती थी सबके सामने उनकी बेइज्जती की जाती थी व्यंग बाण चलाते हुए कहते थे एक हरिश्चंद्र का चेला बैठा है मूर्ख है पागल है जैसे ताने दिए जाते थे ट्रांसफर कर दिया जाता था ऐसी परिस्थितियों में भी इंस्पेक्टर साहब विचलित नहीं होते वह कहते जहां भेज दोगे वही चला जाऊंगा हमारे लिए सब धरती एक समान है वह अपना बिस्तर बांध लेते थे
1 दिन पत्नी ने ताने मारते हुए कहा देखते-देखते मेरे आधे बाल सफेद हो गए कब बनेगा आपका आलीशान बंगला कब आएगी चमचमाती कार बेटे भी जवान हो गए घर में बहू भी तो लानी है इसी दो कमरे में गुजारा होगा क्या ? बहुत जल्द सब हो जाएगा धैर्य रखो इंस्पेक्टर साहब ने निश्चित भाव से कहा अब् बतासे की जगह लड्डू लाने लगे थे
मौका है पुलिस अधीक्षक के सभागार में होने जा रही मीटिंग का सभी थाने के इंस्पेक्टर आए हुए हैं एक-एक करके सभी अपनी भावना व्यक्त करते हुए अपने कार्यों की सराहना बड़ी ही चतुराई के साथ करें रहे है मीटिंग चल रही है मूर्ख पागल एवं हरिश्चंद्र का चेला सभी के वक्तव्य को बड़े ही ध्यान से सुन रहा है सबसे बाद में इंस्पेक्टर साहब को भी बोलने का मौका मिला इंस्पेक्टर साहब जैसे खड़े हुए सभी लोग व्यंगात्मक ढंग से हंसने लगे जिसकी आवाज पूरी सभागार में गूज उठी पुलिस अधीक्षक द्वारा कड़ी फटकार लगाने के बाद ही सभागार शांत हो सका
इंस्पेक्टर साहब अपनी जीवन की उपलब्धियां बताते हुए कहने लगे मैंने हमेशा ही अपना कार्य ईमानदारी एवं जिम्मेदारी से किया जिसके कारण मुझे बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा मैं अपने जीवन में किसी भी प्रकार का भौतिक निर्माण न कर के अपने बेटों की चरित्र का निर्माण किया जिसके कारण आज हमारे दोनों बेटों में एक डॉक्टर और दूसरा बेटा इंजीनियर बन गया है मैं स्वयं उन दोनों के लिए घर बंगला गाड़ी ना खरीद कर उन दोनों को इस लायक बना दिया है कि अब वे दोनों अपने ऐश ओ आराम की सारी चीजें स्वयं खरीद सकते हैं मैंने अपने पिता होने का फर्ज पूरा किया
वहां पर उपस्थित सभी इंस्पेक्टर एक दूसरे के मुंह को देखते हुए कहने लगे हम सबके बीच में यही एक बुद्धिमान है बाकी हम सब मूरख और पागल है

गिरिराज पांडे
वीर मऊ
प्रतापगढ़

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