ग्राम टुडे ख़ास

ओस की बूंदें

सतेन्द्र शर्मा ‘तरंग’

धरा के भाल पर बिंदिया सी चमकती,
कहीं कलियों की लटों से लिपटती।
समेटे तरुणाई की मादकता स्वयं में,
ओस की बूंदें कुछ सुनती कुछ कहतीं।।

सुधाकर की गोद में फलती-फूलतीं,
दिवाकर की किरणों से आभामय होतीं।
नववधु के सोलह श्रृंगार में लिपटी,
यौवन पर अपने बल खातीं, इतराती।।

स्वर्णिम रूप के स्वप्निल भावों से भरी हुईं,
वर्तमान पर पुष्प सी खिलतीं, मुस्करातीं।
वेदना समेटे हृदय में भविष्य से डरी-डरी,
कुछ पल बाद आस्तित्व अपना खो देतीं।।

अश्रु छिप जाते प्रभामंडल के आंचल में,
आस्तित्व खोने के भय से पलकें भिगोतीं।
अरुण बेला में मोहित करें जो हर मन को,
क्षणांश में स्वयं टुकड़े-टुकड़े बिखर जातीं।।

नश्वरता है परिणाम भले ही जीवन का,
तेजोमय रहना है लेकिन जब तक जीवन है।
जाते-जाते मानव को जीवन-सार समझातीं,
ओस की बूंदे प्रकृति का यह सन्देश बतातीं।।

सतेन्द्र शर्मा ‘तरंग’
११६, राजपुर मार्ग,
देहरादून।#

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