ग्राम टुडे ख़ास

कविता शब्दों का जाल नहीं

सीमा गर्ग ” मंजरी “

मैं लिखती हूँ कविता,
हाँ!!
रचती हूँ मैं कविता !
स्वप्नों के उडनखटोले पर ,
हो सवार ,
डूबती भावसागर में,
विचरती विस्तृत अंबर में ,
मन पंछी के पंखों को दे उडान,
अन्तर्चक्षुओं से उन्मीलित ,
वेदना का अहसास ,
भरा हो या प्यार का नगमा,
अन्तर्मन की व्यथा ,
झकझोरती ,
व्याकुल मन होता,
छटपटाता,कुछ कर न पाता,
आद्र अन्तस भिगोये,
तब कुछ शब्द भीगते ,
अहसासों से सिंचित होते ,
डूबकर वेदना की स्याही में ,
कागज पर छलकते ,
कभी आँसू कभी मुस्कान
को सच में जी लेती हूँ ,
हाँ मैं कविता रच लेती हूँ ।।

कविता मेरी जान शान पहचान है,
नस नस में लहू भरे अरमान है।
कुछ बंसती जब भाव सजते ,
ह्रदय स्पन्दन में बसते ,
तब कुछ प्रेममयी भाव ,
अन्तस से मोती,माणिक से झरते ,
नूतन आकार , नवल अक्स ,
भरकर,प्रेमरंग बरसाते ,
ह्रदय होता आह्लादित।
श्रंगारी, संचारी भावों से,
अद्भुत ह्रदयंगम अलंकृत,
कलानिधि की ज्योत्सना से भासित ,
तनमन होता झंकृत ,
सप्तसुरों में भावित ,
स्वप्न सुहाने संजोता ,
मिलकर ख्बाबों में ही,
प्यारे दिलबर से,
आशिक सा ये दिल ,
कभी हँसता कभी रोता ,
कभी वात्सल्यता से भरता ,
कभी वीभत्स जुगुप्सा जगाता ,
कभी वीर रस से भरे तो कभी,
रौद्र, ओज से रंग भरता ,
भ्रमर मानिंद कुसुम मंडलाता,
मन्मथ सा रमणीक सुहाता,
मंजुल मंगल मोद मनाता ,
प्रसून सम महकता ,
रचकर साहित्य के नव्य नवरस,
मानस मन रंगीनियाँ भरता,
कविता शब्दों का जाल नहीं होती।
मंजुल मंगल भाव रग-रग में समोती,
अन्तर्मन से प्रस्फुटित रम्य मनमोहक,
बन जाती कविता मेरी मनमोहिनी ,
नवेली, सहेली, मेरी कविता ,
जो मेरी आत्मा की छटपटाहट,
को शांति और सुकुन देती ,
हृदय तारों में चैन,इकरार भरती,
कलमबद्ध हो जाती ,
सजकर अंलकार, समास,
छंद रूप में कविता का,
यूँ दिव्य आगमन होता,
हाँ!! और यूँ मेरे मन की,
कविता का आगमन होता ||

✍ सीमा गर्ग ” मंजरी “

मेरठ कैंट

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