ग्राम टुडे ख़ास

“काकी की सोच”

कुन्दन कुमारी

नंदिनी अपने भतीजे की शादी में मायका गई थी । एक दिन सुबह-सुबह चाय की चुस्की ली और घूमने निकल गई अचानक रास्ते में काकी से मुलाकात हो गई ।काकी का चेहरा काफी उतरा हुआ था ,वह बहुत मायूस थी। नंदिनी को रहा नहीं गया कि इतनी हंसमुख काकी आज इतनी उदास क्यों है । झट से काकी के पास जाकर प्रणाम की हालचाल पूछी,काकी! क्या बात है ,आप चुप चुप क्यों लग रही हैं !काकी रोने लगी बोली क्या कहे बेटी, मेरे घर में लड़कियों का कतार लग गया है इस बार भी बहू को लड़की हुई है ।ना जाने कब बेटा पैदा होगा बंश कैसे चलेगा । पता नहीं कुलक्षणी कहां से आ गई है ,लगता है बेटा की दूसरी शादी करनी पड़ेगी ।मेरा मनोरथ तब ही पूरा होगा इतना कहते-कहते काकी फूट-फूट कर रोने लगे। नंदिनी को यह सब बात सुनकर बहुत दुख हुआ और आश्चर्य भी हुआ कि अभी भी बेटियों को लोग संतान नहीं समझ पा रहे हैं उसने काकी का आंसू पोछते हुए बोली कि दुनिया बदल गया है आप अभी तक उसी सोच को लेकर क्यों जी रहे हैं काकी !बेटी और बेटा में क्या फर्क है बेटियां क्या नहीं कर सकती सिर्फ उसको अवसर देने की जरूरत काकी , रह गई बात दूसरी शादी की तो आपको जानकारी होनी चाहिए कि बेटी पैदा करने के लिए आपकी बहू कहीं से जिम्मेवार नहीं है आप भी किसी की बेटी है ना काकी, बहू भी किसी की बेटी है, मैं भी किसी की बेटी हूं , बेटी नहीं होगी तो सृष्टि कैसे चलेगी । बेटी ही तो सृष्टि का आधार है काकी ।इतनी बातों को सुन काकी रोना बंद कर दी,जैसे लगा उन्हें आत्मविश्वास जग गया हो कहने लगी ठीक कहती हो बेटी मेरे घर चलो नंदिनी के साथ काकी अपना घर पहुंची। घर पहुंचते ही बहू को गले से लगाई और बोली की बहू मैंने तुम्हारे साथ बहुत दुर्व्यवहार किया, तुम तो लक्ष्मी हो कहते हुए पोती को गोदी में उठा चूम ली । बहू भी सास का बदलते व्यवहार को देखकर सासू मां के गले में लिपट कर फूट फूट रोने लगी जैसे लगा कि उसे नयी जिन्दगी मिल गई हो । अभी भी समाज में बेटी के जन्म पर आंसू ही गिराते हैं जबकि बेटियां भी बेटों के जैसा सब कुछ करके दिखा देती है। नजरिया बदलने की जरूरत है समय आ गया है बेटा और बेटी को बराबरी का दर्जा मिले । बेटों के समान बेटियों को भी समान अवसर मिलेगा तभी समाज विकसित होगा । काकी अपनी सोच बदली, आप अपना सोच कब बदलेगें ?

कुन्दन कुमारी

बेगूसराय, बिहार

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