ग्राम टुडे ख़ास

किरण झा की कलम से

हर रूप में समाया होता है प्रेम


ठंडी शीतल फूहार में
गाते मेघ मल्हार में
नदियों की रवानी में
लहरों की कहानी में
चपला की चपलता में होता है प्रेम
हर रुप में समाया होता है प्रेम

आंखों की सजलता में
राग रंग की मादकता में
शब्दों की नीरवता में
रिश्तों की सहजता में
वाणी की मधुरता में होता है प्रेम
हर रुप में समाया होता है प्रेम

मर्यादित जीवन में
यादों के कानन में
खिलते हुए बचपन में
उन्मादी यौवन में
रिसते हुए सावन में होता है प्रेम
हर रुप में समाया होता है प्रेम

अथाह फैले सागर में
मंडराते मधूकर में
चमकते सुधाकर में
नीले नीले अंबर में
आदीप्त दिनकर में होता है प्रेम
हर रुप में समाया होता है प्रेम

जी चाहता है


बिखरे हुए हर्फ को समेट कर
अल्फाज बनाने को जी चाहता है
ऐ जिन्दगी….
जोड़कर बिखरे पन्नों को इक किताब
बनाने को जी चाहता है
ज़माने के दस्तूर से बहुत ही डरा करते हैं हम
फिर भी अपने भीतर फैले समुंदर को
आबे हयात बनाने को जी चाहता है
थामा है दामन वक्त का लेकिन ठहरे हुए से हैं
सपनों के फलक पर किरण
अपना चांद बनाने को जी चाहता है
किरण झा

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