ग्राम टुडे ख़ास

कुमारी मंजू मानस

सबका मालिक एक है —

सबका मालिक एक है
चाहे रूप अनेक है
कई नाम है मेरे अपने
कोई कहता राम, रहीम
कोई बोले यीशु सदगुरु
कई ग्रंथो में बंटा हुआ हूँ
लेकिन सबमे सटा हुआ हूँ
हर ग्रंथ सिखलाता मुझको
झूठ ना बोलो दिल ना तोड़ो
कभी किसी को नही सतावो
भूखे को भोजन, प्यासे को पानी दो
मंदीर ,मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा
हर जगह शीश नवाते हो
हर दिल हर जीव में मुझको ही पाते हो
सच्चे दिल से मेहनत करना
कभी किसी को दुख ना देना
कभी किसी को नही सताना
जीवन मे कभी नही रुलाना
सुख दुख में साथ निभा कर
मालिक को खुश कर जाना
हमने दो ही रूप बनाये
हर जीव में ही समायें
नर, नारी, उपवन, धरती, गगन
आकाश ,आग और पवन
सूर्य, चंद्रमा, रात ,दिन और चमकते तारे
इस प्रकृति को सुंदर
हमने उपहार दिया
कई जिवो जी रचना कर
सुन्दर से संसार दिया
लेकिन तुमने आज उसको
क्या कर डाला है
अपने सुखमय जीवन की खातिर
इसको बस दुखमय कर डाला है
मानव मेरी सृष्टि को तुम सबने
आज बहुत सताया है
इसके बदले तुमने
आज क्या पाया है
कई रूप में बांट कर
मुझको भी सताये तुम
कई नाम देकर मेरा
भिन्नता दिखलाये तुम
बहती धारा खून की सबमे एक रंग
फिर क्यों लड़ते हो तुम
जाति और धर्म के नाम पर
क्यों आज बिखरते तुम
सिखलावो तुम सबको
धर्म के नाम पे ना लड़ा करो
ये विश्व जगत एक है
यही उपदेश धरा करो
सबकी एक ही चाहत होती
भुख प्यास हवा और पानी
फिर तुम धर्म के नाम पर लड़ते हो
हम है एक है ये बस दिल मे बसा करो
हम एक है सबके मालिक नेक है
ये सृष्टि में तुम रहा करो
सबका मालिक एक है
सबके मालिक नेक है
देते सबको सिख एक है
ये विचार भरा करो

घबराहट

जिंदगी जब शांत शांत लगने लगें
जब किसी आहट से मन डरने लगें

तो घबराहट की लौ जलने लगती है
मन को एक बेचैनी सी लगती है

बेचैनी की फरियाद कैसे और किससे करूँ
उस पल कोई याद आता है तो वो माँ होती है

मन ये सोचता है बहुत रोता है अपनो को छोड़ के
जाने का गम बार बार बहुत होता है

बार बार मरने को कहने वाले उस वक़्त दुवा मांगते है
जिंदगी जीने की आस भगवान से लगा जाते है

कभी कभीं साँसों को तेज होकर रुक जाना
जीवन मे कोई भी अच्छा नही लगना

इस आँखों को चुप चाप यूँही बहा जाना
चुपचाप किसी को ताकते रहना या चुप रहना

ऐ जिंदगी तेरा रास भी जिंदगी को नही आना
बस ना जीने की आस ना मरने की आस लगाना

मनमोहना

ऐ मेरे मन मोहना तुमने
मुझको नित्य प्रेम दिया
अपनी बंसी से मुझको
मेरे हृदय को जीत लिया

प्यार की वर्षा करता है
गोपियों के दिल मे रहता है
प्रियवर उसकी राधिका
अपने प्रेम रंग से भरता है

मुँख पर काले घुंघराले बाल
मैया यशोदा को तंग करता है
माखन घूम घूम चोरी करता
मनमोहना मुझे बहुत लुभायो है

रूप अनोखा लागे उसके
मीठी मधुर संगीत गावत है
गैया के पीछे पीछे मधुवन में
रोज रास रचावात है आवत है

मीठी मुसकान बिखेर के अपनी
सबको अपने दिल मे कर जावत है
मैया के आँख मिचौली से गोपियों को
हरपाल छेड़ के नदियाँ के तीरे आवत है

प्यार की वर्षा करके सबको बहुत
नंदलाल गोपीयों को बहुत रिझावत है
प्रियवर उसकी राधिका अपने प्रेम रंग में
उसको हृदय से हर पल लगावत है

सखा उनके बहुत ही प्यारे प्यारे है
हर गांव में घूम कर करते अद्दा निराले है
पर्वत को उठाने वाले बर्षा से बचाने वाले
महाभारत के प्रपंच में अपना रंग
दिखाने वाले प्रेम खेल रचाये हर पल
ये मेरे मनमोहना है बहुत ही प्यारा

कुमारी मंजू मानस
विहार शिक्षिका
छपरा सारण

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