ग्राम टुडे ख़ास

कैसे अपने : लघुकथा

राजीव भारती

कई दिनों बाद आज़ श्रद्धा अपने घर से बाहर निकली थी। हालांकि वह बात बढ़ाना नहीं चाहती थी। लेकिन तीन वर्षों से सब कुछ सहते हुए उब चुकी थी,तंग आ चुकी थी रोज़ रोज़ की चिक-चिक से।सब कुछ सहने की भी कोई सीमा होती है। प्रारंभ में सब कुछ अच्छा चल रहा था, किन्तु गत छ:माह से दोनों पति-पत्नी के बीच रिश्ते में कुछ खटास आ गयी थी। हालांकि दोनों का एरैंज मैरिज था , फिर भी पता नहीं क्यों उसका पति रोणित बात बात पर ताने देता , उसकी छोटी-छोटी गलतियों के लिए बहुत बुरी तरह से बेइज्जत करता और उसे अपने मायके चले जाने के लिए कहता। किन्तु श्रद्धा विवश थीं, उसने अपनी मां से कई बार फोन से बात की और अपने रिश्ते में चल रही खटास के बारे में बताने की कोशिश की, लेकिन उसकी मां उल्टे उसे बार बार यही समझाती कि बेटा अब ससुराल ही तुम्हारा घर है। कैसे भी रहो वहीं , तुम्हें वहीं अपने रिश्तों में सामंजस्य स्थापित करनी चाहिए। श्रद्धा मां से गिड़गिड़ाते हुए कही भी वह मुझसे अच्छा व्यवहार नहीं करता पर मां के ऊपर कोई असर नहीं हुआ। उसके पापा भी मां की ही बातों से सहमत थे। एक बार विवश होकर उसने आत्महत्या करने की भी कोशिश की किन्तु असफल रही। उसकी सहेली विद्या ने उसे समझाया कि तुम्हारी अपने पति से नहीं बनती तो अलग रह लो उस घर से अलग। कुछ दिन तक तो किराये के मकान में रह लो फिर अपने लिए अलग अपना घर बना लेना। पर पैसे कहां से आयेंगे विद्या, तो वह बोली कि तू तो अच्छी खासी पढ़ी लिखी है कोई अच्छी सी नौकरी कर ले। विद्या की बात श्रद्धा को जंच गई और पति रोणित को बिना बताए एक मल्टीनेशनल कंपनी में इंटरव्यू देने के लिए निकल पड़ी। मैनेजर श्रद्धा के व्यक्तित्व और व्यवहार से बहुत प्रभावित हुआ। किन्तु इंटरव्यू के दौरान उसने बड़ी ही सहजता से श्रद्धा से पूछा कि आप नौकरी क्यों करना चाहतीं हैं? श्रद्धा रुंधे गले से बोली सर मुझे अपना घर बनाना है, इसीलिए। मैनेजर ने फिर पूछा कि क्या आप किराये के घर में रहती हैं, श्रद्धा ने कहा -नहीं ,पति के घर में रहती हूं। फिर मैनेजर बोला कि आपकी क्या समस्या है? आपको अलग घर बनाने की क्या जरूरत है? तो श्रद्धा बोली कि सर वह मुझसे बहुत ही दुर्व्यवहार करता है और मैं जब उसकी इस गलती के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने की कोशिश करती हूं तो वह मुझसे अपने मायके चले जाने को कहता है और अपने पापा मम्मी से इस संदर्भ में बात करती हूं तो वो लोग मुझे यही सलाह देते हैं कि बेटा ससुराल ही तुम्हारा घर है, कैसे भी करके वहीं रहो। मैं बहुत ही असमंजस में हूं, कुछ समझ नहीं पाती। जी सर, आपसे विनम्र निवेदन है कि मुझे अपनी कंपनी में काम करने का अवसर दीजिए, मैं बहुत ही तन्मयता से सब कार्य करुंगी।
जी सर, नौकरी करके सबसे पहले अपने रहने के लिए अपना घर बनाऊंगी ताकि सुकून से अपनी जिंदगी बिता सकूं, रोज़ रोज़ की चिक-चिक से दूर रहकर और मैं आपका हृदय तल से आभारी रहूंगी।
मां बाप अपने होकर भी उस निर्दयी पति के भरोसे छोड़ दिया, पति अपना होकर भी उसे कष्ट देता रहा, परंतु उसकी सहेली विद्या ही श्रद्धा के काम आयी।
ऐसे होते हैं अपने जो वक्त पर सहयोग करने हेतु तत्पर रहते हैं।

राजीव भारती
पटना बिहार गृह नगर

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