ग्राम टुडे ख़ास

कोरोना काल में मेरी धार्मिक यात्रा

लेखिका डा . नलिनी पुरोहित

कैसे पूरा साल गुजर गया । कोरोना आज जाएगा, कल जाएगा , कम से कम 6 महीना तो लगेंगे ….कोरोना सच में जाएगा या यूं ही हमारे दिल दिमाग में बैठ दहशत की दीवार बनाते जाएगा । बस ऐसा ही सोचते विचारते, कभी फोन से बातें करते, दूरियां निभाते ,समय-समय पर कंप्यूटर से चिपक ऑनलाइन प्रोग्राम करते, दिन बताए जा रहे थे ।जी हां ,मैं बात कर रही हूं फरवरी 2020 की ,जिस समय मैं रांची अपने मायके खुशी-खुशी 15 दिन बिता कर आई थी । मेरी छोटी बहन अमेरिका से पतिदेव संग भारत सैर को आई थी ।फरवरी महीने के अंत में ही गुजरात, राजस्थान वगैरह स्थलों में उसे घूमना था अतः:मैं भी गुजरात जल्द आ गई ।बस वह फरवरी 2020 और फिर आया यह फरवरी 2021, कोरोना ने लोगों के दिल दिमाग पर कब्जा कर लिया था ।सब्जी ,कपड़े ,फल -फूल से लेकर हर एक चीज में शंका ने जन्म ले लिया था ।घर में कुछ आया नहीं कि उसके पहले सैनिटाइजेशन एक कंपलसरी टेस्ट सा हो गया था । यह सिर्फ मेरी या मेरे घर की कहानी तो थी नही
हर घर ,हर सांस, हर धड़कन में यही कहानी थी ।दुख तो उस समय होता था जब चाह कर भी अपनों के पास हम जा नहीं सकते थे ।हम इंसान नहीं ,मानो शंका के पिंजड़े के प्राणी हो गए थे ।एक तरफ जहां वन्य प्राणी वन जंगल से निकल कभी-कभी शहर को भी अपना बसेरा समझ, नगरी नगरी, द्वारे द्वारे मतवाला प्रेमी बन अपना दर्शन करा, सुरक्षा कर्मियों की कार्य गति को तीव्र गति शील बना रहे थे। वही मानव घर के पिंजरे में मुस्तैदी से स्वत: कैद हुए जा रहे थे ।प्रकृति में बदले की भावना थी या खुद की रक्षा के लिए उर्जा संग्रहित कर रही थी ।कारण जो भी हो ,किंतु उन दिनों प्रकृति का एक इठलाना ,बादलों का श्वेत वस्त्र धारण करना ,नदियों के दूधिया उफान में कल कल ध्वनि का सरगम पाठ पढ़ाना और वसुंधरा की हरी साड़ी आच्छादित रंग बिरंगे फूलों का परिधान ,प्राणी मात्र को आकर्षित करने में सक्षम था । फेफड़ों में शुद्ध वायु का प्रवाह कोरोना से लड़ने के लिए सक्षम बना तो रहा था किंतु निर्लज्जता की जात पात तो होती नहीं ,इसलिए कोरोना भी निर्लज्ज बन बेरोक टोक किसी के घर में भी बगैर दस्तक , बगैर न्योता के घुसे जा रहा था । इसलिए मानव मात्र प्रकृति के सन्मुख होकर भी उसकी गोद में बैठने से हिचकिचा रहा था । कहीं अपनों से बिछड़ने की घबराहट ,कहीं किसी के जिंदा रहने की आशा, कहीं किसी से हमेशा जुदा होने की आशंका, इसी आंख मिचोली मध्य 2020 हर दिन नया सबक देता, धड़कनें घटाता- बढ़ाता आखिर प्रसार हो ही गया । यह शायद मेरी जिंदगी का पहला साल था जहां मैंने वडोदरा के बाहर पैर ही नहीं रखा होगा ,न किसी मित्र या संबंधी के वहां गई थी, ना कोई पार्टी ना कोई पूजा । बस मन ही मन मैंने ठान लिया था कि मुझे अपने आप को पारितोषिक तो करना ही चाहिए ।क्यों ना 10 15 दिनों के लिए प्रकृति की गोद में बेझिझक बैठ जाऊं ।वैसे तो यह इच्छा बरसों से थी ,पर इस बार तीव्रता कोरोना के निर्लज्जता के घुटन से हुई होगी ।भगवान ने भी मुझे जाने का संकेत दे दिया था ।मेरी एक सीनियर सहकर्मी हरिद्वार जा रही थी ।वही उनके भाई का घर है ।उनके भाई वडोदरा में ही थे ,कोरोना के कारण यहीं फस गए थे और मार्च में वापस जा रहे थे ।मुझे अच्छा साथ मिल रहा था । इस तरह के प्राकृतिक अथवा धार्मिक स्थलों में मैं प्राय: अकेली ही जाती हूं ।वे दोनों हवाई यात्रा कर अहमदाबाद से देहरादून जा रहे थे ,मैंने भी उनके संग टिकट करा ली । दिसंबर महीना था, कोरोना का आतंक थोड़ा कम तो हो गया था ,मैंने सोचा मार्च तक वह उड़न छू हो जाएगा ।जैसे जैसे दिन पास आने लगे मेरे मन में भी विचार आने लगे। मैं अपने सहकर्मी के यहां तो नहीं रुकने वाली थी । किसी आश्रम में रहने का इरादा था ।सोचा अकेले क्या इंजॉय कर पाऊंगी, यही विचार कर मेरी एक मौसेरी बहन जो पुणे में है, और विचारों एवं धार्मिक प्रवृत्ति में मेरी हमजोली है, से मैंने इस बारे में बात की। सोचा एक से भले दो ,उसका साथ मुझे साहित्यिक प्रवृत्ति के लिए भी थोड़ा अकेले रख सकता था ।मेरे प्रस्ताव पर उसने तुरंत हामी भर दी और मुझसे दुगुने उत्साह से जाने की प्लानिंग करने लगी । किंतु कोरोना का डर ऐसा वैसा तो था नहीं ,बीच-बीच में पुन: दूसरे ख्याल आते थे । क्या यह निर्णय सही होगा, मैं सच में जा पाऊंगी, वगैरह वगैरह
मुझे अध्यात्म ने हमेशा आकर्षित किया है ।यूनिवर्सिटी प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्ति के बाद मैंने अपने को पूरा साहित्य के क्षेत्र में रंग दिया । कविता वगैरह मैं बचपन से ही लिखती थी । काव्य मंच में कविता पाठ , कार्यक्रम संचालन, किताबें प्रकाशन वगैरह मैं करती ही थी ।किंतु सेवानिवृत्ति के बाद रसायन शास्त्र से पूर्ण निवृत्ति ले साहित्य क्षेत्र में खो जाने का अनुभव मेरे लिए अत्यंत सुखद था ।इसमें रमने का बल बहुत कुछ मुझे आध्यात्मिक क्षेत्र से भी मिला । मैं वडोदरा के चिन्मय मिशन से कुछ इन्हीं कारण से जुड़ी थी । वैदिक संस्कृति, वैदिक ज्ञान का पुरोधा है यह चिन्मय मिशन । गीता का पठन ,अध्ययन की जिज्ञासा मुझे पहले से ही थी । किंतु नौकरी के चलते समय नहीं दे पाती थी ।वेद -उपनिषद ,अध्ययन हमेशा मेरे लिए बहुमूल्य थे। मानव जीवन सार्थक करने का एकमात्र मार्ग भी वहीं था ।
चिन्मय मिशन अध्यात्म मार्ग का भंडार है। गीता पठन एवं चिंतन – मनन के साथ यहां के अन्य कार्यक्रमों में मेरी रुचि बढ़ती गई । वडोदरा शहर के चिन्मय मिशन के प्रमुख आदरणीय स्वामी देवेशानंद जी से मेरा परिचय मेरी इसी अभिरुचि का परिणाम है। जब मैंने अपनी यात्रा के बारे में उन्हें बताया और यह भी कि उस शांत जगह में ,मां गंगा के सानिध्य में ,मैं अपनी साहित्यिक प्रवृत्ति लेखन पठन भी करना चाहती हूं ।मेरी इच्छा जानने के बाद उन्होंने कहा फिर हरिद्वार ही क्यों, उत्तरकाशी अति सुंदर शांत रमणीय मां गंगा की गोद में बसा देवों का आशीर्वाद ,भूमिस्वरुप है। बस उस पल से ही मुझ में तीव्र इच्छा समा गई, देवभूमि के उस खंड के दर्शनार्थ की ।अकेले जाने में थोड़ी झिझक थी किंतु विचार पक्के थे। पूर्ण आश्वस्त मैं तब ही हो गई थी जब स्वामी जी ने कहा वहां चिन्मय मिशन का आश्रम गंगा तट पर ही है । मुझे लगने लगा प्रभु का संकेत भी शायद यही है ।कभी-कभी कोरोना का खौफ बीच-बीच में डर तो पैदा कर ही देता था।
मंगलवार और शनिवार स्वामी जी सुंदरकांड का पाठ आश्रम में ही करते थे ।हिदायतें थी , समय, काल परिस्थिति ध्यान में रखते हुए हम घर पर ही सुंदरकांड कर ले । किंतु कभी-कभी वहां जाकर पाठ करने में भी उन्हें आपत्ति नहीं थी ।वैसे भी उस समय हम तीन चार साधक ,सत्संगी ही रहते थे ।ऐसे ही किसी मंगलवार में मैं वहां गई थी। स्वामी जी ने मेरी काशी योजना के बारे पूछा मैंने फिर वही उत्तर दिया। इच्छा तो है पर अमल होगा कि नहीं हमेशा शंका रहती है ।उन दिनों स्वामी जी को अपने आश्रम के काम से उत्तरकाशी जाना था ।मुझे भनक लगती ही मैंने कहा ऐसा नहीं हो सकता ,हम साथ में चले ।कुछ दिन बाद स्वामी जी का जवाब हां में आया मेरी खुशी का ठिकाना ही न था ।मेरी एक मित्र bank of baroda से इसी साल में सेवानिवृत्ति हुई थी, उसने भी जाने की इच्छा जाहिर की ।उसने स्वयं फलाइट टिकट ले ली । airlines के नियमों का पालन करते हमने कोरोना का 48 घंटे पहले टेस्ट भी करा लिया था ।जब हम सारे नियमों का पालन करते हुए किसी यात्रा के लिए प्रस्थान करते हैं, तो हमारा आत्मविश्वास भी ऊंचाई के चरम सीमा पर होता है। यहां तो भगवान के दूत स्वामी जी स्वयं हमारे साथ थे, इसीलिए नकारात्मक विचारों के घुसने की कहीं जगह ही नहीं थी ।
‌‌अपने निर्धारित समय पर हम सब अहमदाबाद एयरपोर्ट पर मिले । वहां से देहरादून की यात्रा पलक झपकते ही हो गई ।वैसे भी एक सवा घंटे की यात्रा में समय बिताने जैसा कुछ रहता ही नहीं । उत्तरकाशी आश्रम से हमें लेने गाडी एक दिन पहले ही आ गई थी । ताकि हमारी यात्रा निर्धारित समय पर चलती रहे । देहरादून से उत्तरकाशी डेढ सौ किलोमीटर ही है ।दूरी तो ज्यादा नहीं है किंतु पहाड़ी रस्ते के कारण यह सफर पांच घंटे का होता है ।हम लोगों ने पहले चाय के साथ नाश्ता वगैरह किया और 11:00 बजे के आसपास निकल गए ताकि 5:00 बजे तक वहां पहुंच सके। हमारे साथ स्वामी जी थे ,वातावरण अलग सात्विक था।आम दिनों में हम भगवान की चर्चा कम इधर-उधर की बातें ज्यादा करते हैं ।किसी की मीनमेख निकालना,अकारण बातें ज्यादा करना , फिल्मों की बातें करना वगैरह वगेरह ।यहां तो हमारे सामने सुंदर पहाड़ ,गोला कार रस्ते, हंसती वादियां और आध्यात्मिक अनुराग था ।सफर की शुरुआत हम सब ने हनुमान चालीसा से की ।अपनी-अपनी बारी आने पर सबको एक-एक करके हनुमान चालीसा शुरू करना होता था ।शुरुआत ‘श्री गुरु चरण सरोज…..
एक अकेले को ही करना होता था । बाद में सब साथ देते थे । इस तरह से सात बार हम सब ने हनुमान चालीसा का पाठ किया । सफ़र मध्य जो भी बात जानने लायक होती थी, स्वामी जी बताते थे ।फिर लंच के लिए हम एक सुंदर जगह उतरे ।भोजन उपरांत आधे घंटे बाद पुनः सफर शुरू हुआ ।फिर से हनुमान चालीसा का पाठ किया ।आप मानेंगे नहीं मैं प्रकृति अवलोकन करते और हनुमान चालीसा पाठ करते इतना रम गई थी कि मुझे यह याद ही नहीं रहा कि घुमावदार घाटियों में अक्सर मुझे असहजता, उल्टी वगैरह होती है ।शाम में जैसे ही उत्तरकाशी आने वाला था , हमने पुन:हनुमान चालीसा पढ़ते उत्तरकाशी का स्वागत किया या उत्तरकाशी ने हमारा स्वागत किया । हम तो आध्यात्म- प्रकृति के बीच सात्विक अनुभव के रसपान से रोमांचित थे । कल कल गंगा देखने के बाद हम तीनों ही भाव विभोर हो गए ।जय गंगे के नादसे हमारी गाड़ी गूंज उठी। हम सब ने बहुत भाव, श्रद्धा ,प्रेम से मां गंगे को नमन किया । थोड़े ही अंतराल में अचानक गाड़ी रुक गई ।सामने मां गंगे की कल कल गूंजी ।सड़क के एक तरफ छह सात लोग हमारे स्वागत के लिए खड़े थे ।सुखद आश्चर्य हुआ, उनमें से एक उत्तरकाशी चिन्मयमिशन के प्रमुख स्वामी श्री देवात्मानंद जी थे । वड़ोदरा की प्रमुख स्वामी जी के स्वागत में स्वयं आए थे। उन सबका मिलना हरिओम की गूंज सुहानी लग रही थी ।आश्रम के कर्मचारियों ने हमारा लगेज ले रखा था ,जितना उठा सकते थैला हम तीनों ने उठा लिया था । मुझे रोड पर तो कोई बिल्डिंग दिखाई नहीं दी ,पर जब सिर उपर किया , आश्रम की झलक टुकडे टुकडे में हुई । इतना सुंदर पहले थोड़ी चढ़ाई ,उसके बाद कुछ कमरे फिर बरामदा ।फिर उसके साथ लगी आकर्षक सीढ़ियां ,बीच बीच में सुंदर-सुंदर फूल गमले में सजे हुए ।ऊपर चढ़ते ही स्वामी तपोवन महाराज जी की कुटिया थी ।जहां आखरी समय में स्वामी जी रहते थे ।वही उनके ध्यान योग की जगह थी । हाथ धोकर हम सब पहले वहीं गए, अत्यंत पवित्र धरती ,पवित्रता चहूं और बिखरी पड़ी थी । हमारे तन मन में मानो एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो रहा था । धीरे धीरे यह हमारेअंदर आने का सुगम मार्ग बना रही थी । सामने तपोवन जी महाराज का बड़ा चित्र लगा हुआ था ।अखंड दीया , नीचे मोटी मोटी सुंदर कालीन, हम सबआंख बंद कर थोड़ी देर वहीं बैठे रहे ।कोई आधुनिकता नहीं, पुराने समय के कमरे, छोटे-छोटे दरवाजे ,बंद करने की सिकड़ी, चिटकनी, सामने छोटा आंगन सा बालकनी, बीच में हवन कुंड एवं सफाई में तरबतोर पवित्र वसुंधरा । उस कमरे से लगे छोटे कमरे में हम एक-एक करके गए जहां सिर्फ एक दीया था ,वही तपोवन जी महाराज का योग का कमरा था । हम सब आंखें बंद कर उस सुखद अनुभूति को जकड़े रखना चाहते थे, किंतु वहां दर्शन कर थोड़ी देर ही बैठ सकते थे ।बाहर कालीन में जितनी देर चाहे बैठ सकते हैं ।

वहीं सामने से गंगा का स्पष्ट रूप उभर रहा था वेग में बहती हुई सफेद दूधिया धार संग अविरल बहे जा रही थी । ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वर्षों बाद बेटी मां को मिल आनंद विभोर हो बावरी हुए जा रही थी । मैं पवित्रता अपने तन मन में महसूस कर एक लहर ही बन गयी थी ।कोरोना काल में मेरी धार्मिक यात्रा कैसे पूरा साल गुजर गया । कोरोना आज जाएगा, कल जाएगा , कम से कम 6 महीना तो लगेंगे ….कोरोना सच में जाएगा या यूं ही हमारे दिल दिमाग में बैठ दहशत की दीवार बनाते जाएगा । बस ऐसा ही सोचते विचारते, कभी फोन से बातें करते, दूरियां निभाते ,समय-समय पर कंप्यूटर से चिपक ऑनलाइन प्रोग्राम करते, दिन बताए जा रहे थे ।जी हां ,मैं बात कर रही हूं फरवरी 2020 की ,जिस समय मैं रांची अपने मायके खुशी-खुशी 15 दिन बिता कर आई थी । मेरी छोटी बहन अमेरिका से पतिदेव संग भारत सैर को आई थी ।फरवरी महीने के अंत में ही गुजरात, राजस्थान वगैरह स्थलों में उसे घूमना था अतः:मैं भी गुजरात जल्द आ गई ।बस वह फरवरी 2020 और फिर आया यह फरवरी 2021, कोरोना ने लोगों के दिल दिमाग पर कब्जा कर लिया था ।सब्जी ,कपड़े ,फल -फूल से लेकर हर एक चीज में शंका ने जन्म ले लिया था ।घर में कुछ आया नहीं कि उसके पहले सैनिटाइजेशन एक कंपलसरी टेस्ट सा हो गया था । यह सिर्फ मेरी या मेरे घर की कहानी तो थी नही हर घर ,हर सांस, हर धड़कन में यही कहानी थी ।दुख तो उस समय होता था जब चाह कर भी अपनों के पास हम जा नहीं सकते थे ।हम इंसान नहीं ,मानो शंका के पिंजड़े के प्राणी हो गए थे ।एक तरफ जहां वन्य प्राणी वन जंगल से निकल कभी-कभी शहर को भी अपना बसेरा समझ, नगरी नगरी, द्वारे द्वारे मतवाला प्रेमी बन अपना दर्शन करा, सुरक्षा कर्मियों की कार्य गति को तीव्र गति शील बना रहे थे। वही मानव घर के पिंजरे में मुस्तैदी से स्वत: कैद हुए जा रहे थे ।प्रकृति में बदले की भावना थी या खुद की रक्षा के लिए उर्जा संग्रहित कर रही थी ।कारण जो भी हो ,किंतु उन दिनों प्रकृति का एक इठलाना ,बादलों का श्वेत वस्त्र धारण करना ,नदियों के दूधिया उफान में कल कल ध्वनि का सरगम पाठ पढ़ाना और वसुंधरा की हरी साड़ी आच्छादित रंग बिरंगे फूलों का परिधान ,प्राणी मात्र को आकर्षित करने में सक्षम था । फेफड़ों में शुद्ध वायु का प्रवाह कोरोना से लड़ने के लिए सक्षम बना तो रहा था किंतु निर्लज्जता की जात पात तो होती नहीं ,इसलिए कोरोना भी निर्लज्ज बन बेरोक टोक किसी के घर में भी बगैर दस्तक , बगैर न्योता के घुसे जा रहा था । इसलिए मानव मात्र प्रकृति के सन्मुख होकर भी उसकी गोद में बैठने से हिचकिचा रहा था । कहीं अपनों से बिछड़ने की घबराहट ,कहीं किसी के जिंदा रहने की आशा, कहीं किसी से हमेशा जुदा होने की आशंका, इसी आंख मिचोली मध्य 2020 हर दिन नया सबक देता, धड़कनें घटाता- बढ़ाता आखिर प्रसार हो ही गया । यह शायद मेरी जिंदगी का पहला साल था जहां मैंने वडोदरा के बाहर पैर ही नहीं रखा होगा ,न किसी मित्र या संबंधी के वहां गई थी, ना कोई पार्टी ना कोई पूजा । बस मन ही मन मैंने ठान लिया था कि मुझे अपने आप को पारितोषिक तो करना ही चाहिए ।क्यों ना 10 15 दिनों के लिए प्रकृति की गोद में बेझिझक बैठ जाऊं ।वैसे तो यह इच्छा बरसों से थी ,पर इस बार तीव्रता कोरोना के निर्लज्जता के घुटन से हुई होगी ।भगवान ने भी मुझे जाने का संकेत दे दिया था ।मेरी एक सीनियर सहकर्मी हरिद्वार जा रही थी ।वही उनके भाई का घर है ।उनके भाई वडोदरा में ही थे ,कोरोना के कारण यहीं फस गए थे और मार्च में वापस जा रहे थे ।मुझे अच्छा साथ मिल रहा था । इस तरह के प्राकृतिक अथवा धार्मिक स्थलों में मैं प्राय: अकेली ही जाती हूं ।वे दोनों हवाई यात्रा कर अहमदाबाद से देहरादून जा रहे थे ,मैंने भी उनके संग टिकट करा ली । दिसंबर महीना था, कोरोना का आतंक थोड़ा कम तो हो गया था ,मैंने सोचा मार्च तक वह उड़न छू हो जाएगा ।जैसे जैसे दिन पास आने लगे मेरे मन में भी विचार आने लगे। मैं अपने सहकर्मी के यहां तो नहीं रुकने वाली थी । किसी आश्रम में रहने का इरादा था ।सोचा अकेले क्या इंजॉय कर पाऊंगी, यही विचार कर मेरी एक मौसेरी बहन जो पुणे में है, और विचारों एवं धार्मिक प्रवृत्ति में मेरी हमजोली है, से मैंने इस बारे में बात की। सोचा एक से भले दो ,उसका साथ मुझे साहित्यिक प्रवृत्ति के लिए भी थोड़ा अकेले रख सकता था ।मेरे प्रस्ताव पर उसने तुरंत हामी भर दी और मुझसे दुगुने उत्साह से जाने की प्लानिंग करने लगी । किंतु कोरोना का डर ऐसा वैसा तो था नहीं ,बीच-बीच में पुन: दूसरे ख्याल आते थे । क्या यह निर्णय सही होगा, मैं सच में जा पाऊंगी, वगैरह वगैरह मुझे अध्यात्म ने हमेशा आकर्षित किया है ।यूनिवर्सिटी प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्ति के बाद मैंने अपने को पूरा साहित्य के क्षेत्र में रंग दिया । कविता वगैरह मैं बचपन से ही लिखती थी । काव्य मंच में कविता पाठ , कार्यक्रम संचालन, किताबें प्रकाशन वगैरह मैं करती ही थी ।किंतु सेवानिवृत्ति के बाद रसायन शास्त्र से पूर्ण निवृत्ति ले साहित्य क्षेत्र में खो जाने का अनुभव मेरे लिए अत्यंत सुखद था ।इसमें रमने का बल बहुत कुछ मुझे आध्यात्मिक क्षेत्र से भी मिला । मैं वडोदरा के चिन्मय मिशन से कुछ इन्हीं कारण से जुड़ी थी । वैदिक संस्कृति, वैदिक ज्ञान का पुरोधा है यह चिन्मय मिशन । गीता का पठन ,अध्ययन की जिज्ञासा मुझे पहले से ही थी । किंतु नौकरी के चलते समय नहीं दे पाती थी ।वेद -उपनिषद ,अध्ययन हमेशा मेरे लिए बहुमूल्य थे। मानव जीवन सार्थक करने का एकमात्र मार्ग भी वहीं था । चिन्मय मिशन अध्यात्म मार्ग का भंडार है। गीता पठन एवं चिंतन – मनन के साथ यहां के अन्य कार्यक्रमों में मेरी रुचि बढ़ती गई । वडोदरा शहर के चिन्मय मिशन के प्रमुख आदरणीय स्वामी देवेशानंद जी से मेरा परिचय मेरी इसी अभिरुचि का परिणाम है। जब मैंने अपनी यात्रा के बारे में उन्हें बताया और यह भी कि उस शांत जगह में ,मां गंगा के सानिध्य में ,मैं अपनी साहित्यिक प्रवृत्ति लेखन पठन भी करना चाहती हूं ।मेरी इच्छा जानने के बाद उन्होंने कहा फिर हरिद्वार ही क्यों, उत्तरकाशी अति सुंदर शांत रमणीय मां गंगा की गोद में बसा देवों का आशीर्वाद ,भूमिस्वरुप है। बस उस पल से ही मुझ में तीव्र इच्छा समा गई, देवभूमि के उस खंड के दर्शनार्थ की ।अकेले जाने में थोड़ी झिझक थी किंतु विचार पक्के थे। पूर्ण आश्वस्त मैं तब ही हो गई थी जब स्वामी जी ने कहा वहां चिन्मय मिशन का आश्रम गंगा तट पर ही है । मुझे लगने लगा प्रभु का संकेत भी शायद यही है ।कभी-कभी कोरोना का खौफ बीच-बीच में डर तो पैदा कर ही देता था। मंगलवार और शनिवार स्वामी जी सुंदरकांड का पाठ आश्रम में ही करते थे ।हिदायतें थी , समय, काल परिस्थिति ध्यान में रखते हुए हम घर पर ही सुंदरकांड कर ले । किंतु कभी-कभी वहां जाकर पाठ करने में भी उन्हें आपत्ति नहीं थी ।वैसे भी उस समय हम तीन चार साधक ,सत्संगी ही रहते थे ।ऐसे ही किसी मंगलवार में मैं वहां गई थी। स्वामी जी ने मेरी काशी योजना के बारे पूछा मैंने फिर वही उत्तर दिया। इच्छा तो है पर अमल होगा कि नहीं हमेशा शंका रहती है ।उन दिनों स्वामी जी को अपने आश्रम के काम से उत्तरकाशी जाना था ।मुझे भनक लगती ही मैंने कहा ऐसा नहीं हो सकता ,हम साथ में चले ।कुछ दिन बाद स्वामी जी का जवाब हां में आया मेरी खुशी का ठिकाना ही न था ।मेरी एक मित्र bank of baroda से इसी साल में सेवानिवृत्ति हुई थी, उसने भी जाने की इच्छा जाहिर की ।उसने स्वयं फलाइट टिकट ले ली । airlines के नियमों का पालन करते हमने कोरोना का 48 घंटे पहले टेस्ट भी करा लिया था ।जब हम सारे नियमों का पालन करते हुए किसी यात्रा के लिए प्रस्थान करते हैं, तो हमारा आत्मविश्वास भी ऊंचाई के चरम सीमा पर होता है। यहां तो भगवान के दूत स्वामी जी स्वयं हमारे साथ थे, इसीलिए नकारात्मक विचारों के घुसने की कहीं जगह ही नहीं थी । ‌‌अपने निर्धारित समय पर हम सब अहमदाबाद एयरपोर्ट पर मिले । वहां से देहरादून की यात्रा पलक झपकते ही हो गई ।वैसे भी एक सवा घंटे की यात्रा में समय बिताने जैसा कुछ रहता ही नहीं । उत्तरकाशी आश्रम से हमें लेने गाडी एक दिन पहले ही आ गई थी । ताकि हमारी यात्रा निर्धारित समय पर चलती रहे । देहरादून से उत्तरकाशी डेढ सौ किलोमीटर ही है ।दूरी तो ज्यादा नहीं है किंतु पहाड़ी रस्ते के कारण यह सफर पांच घंटे का होता है ।हम लोगों ने पहले चाय के साथ नाश्ता वगैरह किया और 11:00 बजे के आसपास निकल गए ताकि 5:00 बजे तक वहां पहुंच सके। हमारे साथ स्वामी जी थे ,वातावरण अलग सात्विक था।आम दिनों में हम भगवान की चर्चा कम इधर-उधर की बातें ज्यादा करते हैं ।किसी की मीनमेख निकालना,अकारण बातें ज्यादा करना , फिल्मों की बातें करना वगैरह वगेरह ।यहां तो हमारे सामने सुंदर पहाड़ ,गोला कार रस्ते, हंसती वादियां और आध्यात्मिक अनुराग था ।सफर की शुरुआत हम सब ने हनुमान चालीसा से की ।अपनी-अपनी बारी आने पर सबको एक-एक करके हनुमान चालीसा शुरू करना होता था ।शुरुआत ‘श्री गुरु चरण सरोज….. एक अकेले को ही करना होता था । बाद में सब साथ देते थे । इस तरह से सात बार हम सब ने हनुमान चालीसा का पाठ किया । सफ़र मध्य जो भी बात जानने लायक होती थी, स्वामी जी बताते थे ।फिर लंच के लिए हम एक सुंदर जगह उतरे ।भोजन उपरांत आधे घंटे बाद पुनः सफर शुरू हुआ ।फिर से हनुमान चालीसा का पाठ किया ।आप मानेंगे नहीं मैं प्रकृति अवलोकन करते और हनुमान चालीसा पाठ करते इतना रम गई थी कि मुझे यह याद ही नहीं रहा कि घुमावदार घाटियों में अक्सर मुझे असहजता, उल्टी वगैरह होती है ।शाम में जैसे ही उत्तरकाशी आने वाला था , हमने पुन:हनुमान चालीसा पढ़ते उत्तरकाशी का स्वागत किया या उत्तरकाशी ने हमारा स्वागत किया । हम तो आध्यात्म- प्रकृति के बीच सात्विक अनुभव के रसपान से रोमांचित थे । कल कल गंगा देखने के बाद हम तीनों ही भाव विभोर हो गए ।जय गंगे के नादसे हमारी गाड़ी गूंज उठी। हम सब ने बहुत भाव, श्रद्धा ,प्रेम से मां गंगे को नमन किया । थोड़े ही अंतराल में अचानक गाड़ी रुक गई ।सामने मां गंगे की कल कल गूंजी ।सड़क के एक तरफ छह सात लोग हमारे स्वागत के लिए खड़े थे ।सुखद आश्चर्य हुआ, उनमें से एक उत्तरकाशी चिन्मयमिशन के प्रमुख स्वामी श्री देवात्मानंद जी थे । वड़ोदरा की प्रमुख स्वामी जी के स्वागत में स्वयं आए थे। उन सबका मिलना हरिओम की गूंज सुहानी लग रही थी ।आश्रम के कर्मचारियों ने हमारा लगेज ले रखा था ,जितना उठा सकते थैला हम तीनों ने उठा लिया था । मुझे रोड पर तो कोई बिल्डिंग दिखाई नहीं दी ,पर जब सिर उपर किया , आश्रम की झलक टुकडे टुकडे में हुई । इतना सुंदर पहले थोड़ी चढ़ाई ,उसके बाद कुछ कमरे फिर बरामदा ।फिर उसके साथ लगी आकर्षक सीढ़ियां ,बीच बीच में सुंदर-सुंदर फूल गमले में सजे हुए ।ऊपर चढ़ते ही स्वामी तपोवन महाराज जी की कुटिया थी ।जहां आखरी समय में स्वामी जी रहते थे ।वही उनके ध्यान योग की जगह थी । हाथ धोकर हम सब पहले वहीं गए, अत्यंत पवित्र धरती ,पवित्रता चहूं और बिखरी पड़ी थी । हमारे तन मन में मानो एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो रहा था । धीरे धीरे यह हमारेअंदर आने का सुगम मार्ग बना रही थी । सामने तपोवन जी महाराज का बड़ा चित्र लगा हुआ था ।अखंड दीया , नीचे मोटी मोटी सुंदर कालीन, हम सबआंख बंद कर थोड़ी देर वहीं बैठे रहे ।कोई आधुनिकता नहीं, पुराने समय के कमरे, छोटे-छोटे दरवाजे ,बंद करने की सिकड़ी, चिटकनी, सामने छोटा आंगन सा बालकनी, बीच में हवन कुंड एवं सफाई में तरबतोर पवित्र वसुंधरा । उस कमरे से लगे छोटे कमरे में हम एक-एक करके गए जहां सिर्फ एक दीया था ,वही तपोवन जी महाराज का योग का कमरा था । हम सब आंखें बंद कर उस सुखद अनुभूति को जकड़े रखना चाहते थे, किंतु वहां दर्शन कर थोड़ी देर ही बैठ सकते थे ।बाहर कालीन में जितनी देर चाहे बैठ सकते हैं । वहीं सामने से गंगा का स्पष्ट रूप उभर रहा था वेग में बहती हुई सफेद दूधिया धार संग अविरल बहे जा रही थी । ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वर्षों बाद बेटी मां को मिल आनंद विभोर हो बावरी हुए जा रही थी । मैं पवित्रता अपने तन मन में महसूस कर एक लहर ही बन गयी थी ।

प्रस्तुति : राजीव कुमार झा

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