ग्राम टुडे ख़ास

कोहरे में सच्चाई

राकेश चंद्रा


यूँ तो फेक अर्थात् झूठ एवं मनगढ़न्त खबरों का इतिहास काफी पुराना है। पिछले कुछ वर्षों में पूरे विश्व में इस प्रकार की खबरों की मानो बाढ़ सी आ गयी है। प्रिन्ट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया दोनो ही इसके प्रभाव से मुक्त नहीं हैं। यद्यपि प्रिन्ट मीडिया में इसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम देखने को मिलता है। इसका कारण यह है कि प्रिन्ट मीडिया में छपने वाली सामग्री को संपादक मंडल द्वारा परीक्षण के पश्चात् ही प्रकाशित किया जाता है। जबकि इलेक्ट्रानिक मीडिया में तात्कालिकता को दृष्टिगत रखते हुए खबरों को प्रसारित कर दिया जाता है और प्रिन्ट मीडिया के समानान्तर सम्पादकीय पर्यवेक्षण का कदाचित अवसर प्राप्त नहीं हो पाता है। इसके अतिरिक्त फेक न्यूज का एक बड़ा óोत सोशल मीडिया है। फेसबुक, ट्विटर एवं व्हाट्सएप पर मुख्यतः इस प्रकार की झूठी खबरों का प्रचार-प्रसार निर्बाध रूप से होता रहता है। इन सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर किसी प्रकार का संपादकीय पर्यवेक्षण उपलब्ध नहीं होता है। कोई भी व्यक्ति स्वतन्त्र रूप से किसी तथ्यात्मक सूचना या समाचार को मनचाहे ढंग से तोड़मरोड़ कर कुछ सेंकड में अग्रप्रेषित कर सकता हैं। इस प्रकार क्षण भर में इस प्रकार की खबरें एक साथ असंख्य लोगों तक पहुँच जाती हैं और अक्सर इनका दुष्प्रभाव परस्पर वैमनस्यता से लेकर सार्वजनिक हिंसा के रूप में परिलक्षित होती है।
गत वर्ष अपने देश में फेक न्यूज़ के चलते हिंसात्मक घटनाओं में सौ से अधिक लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे। इसमें मुख्य रूप से गौकशी एवं बच्चे चुराने की सुम्भावित गतिविधियों को दृष्टिगत रखते हुए झूठी सूचनाएँ प्रसारित करने के फलस्वरूप होने वाली हिंसात्मक घटनाएँ शामिल हैं। अनजान व्यक्तियों की वेष-भूषा एवं चाल-ढाल देखकर कतिपय व्यक्तियों द्वारा व्वाहट्सएप ग्रुप या फेसबुक पर उनकी फोटो पोस्ट कर बाकी लोगों को यह संदेश दिया जाता है कि अमुक व्यक्ति गौ-तस्करी में शामिल है या फिर किसी बच्चा चुराने के गैंग से सम्बन्धित हैं। सोशल मीडिया का प्रसार किसी से छिपा नहीं है, फलस्वरूप एकाएक भीड़ एकत्रित हो जाती है और तद्क्रम में उत्पन्न हिंसात्मक प्रवृत्तियों के फलस्वरूप अधिकतर निर्दोष लोग मारे जाते हैं।
फेक न्यूज का एक और नकारात्मक असर आम चुनाव के दौरान देखा गया है। विश्वस्तर पर देखें तो वर्ष 2016 में अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्वाचन में इस प्रकार की मनगढ़न्त खबरों की विशेष भूमिका रही है जिसकी जाँच विभिन्न एजेंसियों द्वारा अभी भी चल रही है। इसी प्रकार ब्रिटेन में हुए ब्रेक्सिट रेफरेन्डम में भी इसी प्रकार की खबरों ने विशिष्ट भूमिका निभायी थी। भारत में भी हर चुनाव में भाँति-भाँति की झूठी एवं मनगढ़न्त खबरें उम्मीदवारों एवं राजनैतिक पार्टियों के सम्बन्ध में सोशल मीडिया पर विशेष रूप से प्रचारित की जाती हैं। वर्षानुवर्ष इस प्रवृत्ति में वृद्धि हो रही है। यद्यपि निर्वाचन आयोग इस सम्बन्ध में प्रत्येक चुनाव से पहले सम्यक अनुदेश जारी करता है, पर फिलहाल किसी प्रकार की प्रभावी रोक लगता सम्भव नहीं हो पा रहा है।
यहाँ पर यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि केवल कानून से इस समस्या का समाधान सम्भव प्रतीत नहीं हो रहा है। सोशल मीडिया पर नियन्त्रण करना सरकार के लिये भी आसान नहीं है। अतः इस दिशा में सभ्य समाज को अपना दायित्व निभाने के लिये आगे आना होगा। भीड़तंत्र किसी भी दशा में लोकतंत्र के लिये घातक है। जहाँ यह शासन-प्रशासन की कमजोरी दिखाता है, वहीं दूसरी ओर यह नागरिकों की उदासीनता एवं अन्यमनस्कता का भी द्योतक हैं। उच्च साक्षरता वाले शिक्षित नागरिक यदि यह ठान लें कि वे किसी भी दशा में ऐसे किसी संदेश को फारवर्ड नहीं करेंगे जो प्रथमदृष्टयः समाजविरोधी, देश विरोधी, अतार्किक एवं अपुष्ट होंगे, तो झूठी खबरों को आगे फैलने का अवसर ही प्राप्त नहीं होगा। अवांछित अराजक तत्व हमारी इसी कमजोरी का लाभ उठाकर भीडतंत्र को जागृत करके समाज में हिंसा एवं नफरत का तांडव कराने में सफल रहते हैं। सरकार इस दिशा में अग्रिम प्रयास कर रही है, पर हमें अभी पहल करना बाकी हैं। एक छोटी सी शुरूआत से बड़ी दुर्घटनाएँ टल सकती हैं, राष्ट्रहित मैं ऐसा करना आज के समय की प्रमुख आवश्यकता है- हमें यह समझना होगा।

राकेश चंद्रा
610/60, केशव नगर कालोनी सीतापुर रोड, लखनऊ उत्तर-प्रदेश-226020

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