ग्राम टुडे ख़ास

खण्डहर-!

शरद कुमार पाठक

क्या देख रहे हो इस खण्डहर को
जो ये अपने बीते हुए कल को
फिर से ढूंढ रहा है।
ये विछिप्त प्राचीरें जिसमें बारीकता से हाथों द्वारा गढ़ी गई शिल्पकारी
और राखी चूना से किसी राजगीर द्वारा किया गया निर्माण
किसी जमाने में ये अपनी सुन्दरता और मोहकता का पर्याय बना होगा।
ये विछप्त सन्नाटे से छाया हुआ आंँगन और ये झिल्लिका की सीं सीं करती हुयी आवाजें किसी विभित्सिता से कम नहीं है।
कभी कभी इसमें भी नूपरों की झनक
और किलकारों से गूंजता हुआ ये आंगन कितना अच्छा लगता होगा।
और समय समय पर ढोलक की थापें
और मंजीरों की झन्कार से ये गूंजता हुआ आंँगन एक भरे चुने खुशहाल व सुखी परिवार की ओर संकेत देता होगा ।पर आज ये सन्नाटे से पसरा हुआ आंगन अपने बीते हुए कल
को फिर से ढूंढ रहा है
ये एक दीपक के लव की चाह
लिए हुए विछिप्त प्राचीरों में
ये छोटे-छोटे ताख
ये आज भी खुद को एक
दीपक की लव से प्रकाशित
देखना चाहते हैं।
ये लम्बी लम्बी सफीलें और
दलाने ये आज भी किसी बैठक
का इन्तजार कर रही हैं
क्या देख रहे हो इस खण्डहर को
जो अपने बीते हुए कल को
आज फिर से ढूंढ रहा है

शरद कुमार पाठक

डिस्टिक—–(हरदोई)
समाचार पत्र के लिए

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