ग्राम टुडे ख़ास

छात्र जीवन में गुरु और मित्रों का महत्व

संस्मरण

यदि संस्कार परिवार से मिल जाए तो मित्र और गुरु सहजता से मिल जाते हैं………

                                राकेश जाखेटिया ,दिल्ली से

          जीवन में बहुत बदलाव आते हैं जब आप गुरु की शरण में चले जाते हैं ! ऐसा मेरा साथ भी हुआ । कहते हैं सोबत का असर पड़ता है ... मेरे जीवन में भी हुआ ! 
         छात्र जीवन में गुरु आर .एन केला जी ,  गौतम गुरु  , द्विवेदी गुरु  , मुमताज अहमद खां गुरु , के. सी मठपाल जी एवम् नारंग सर आदि अनेकों गुरुजनों एवं मित्रों के आशीष  वचनों ने जीवन को एक नया मोड़  दिया  !  प्रारंभ मे हमेशा असफलता ही हाथ लगती थी ! गुरुओं के तानों से मन विचलित हो जाता था  परंतु वह एकदम चैलेंज बन कर सामने खड़ा हो जाता था .....इसमें प्रमुख जिस साल तू पास हो जाएगा , उस साल बोर्ड टूट जाएगा  (बोर्ड का अभिप्राय  यु.पी. बोर्ड से था ) , तुम्हारे खानदान में भी किसी की फर्स्ट डिवीजन आई है क्या , अगर पढ़ाई नहीं करनी तो नीचे बराबर में मोची की दुकान पर बैठ जाओ  आदि अनेकों शब्दों से छात्र जीवन में अपमानित होना पड़ा था  ! 

          स्वतंत्र संग्राम सेनानी के पुत्र होने के कारण पोस्ट ग्रेजुएट तक शिक्षा निशुल्क पाई  ! रुपए  की कदर बचपन से ही रही ! पोस्ट ऑफिस के सेविंग बैंक में रुपए दो  रुपए भी जमा कराने की आदत रही ! वह पासबुक तथा उसके पैसे आज भी एक धरोहर के रूप में  आज मेरे पास है ! 

         छात्र जीवन में पूंजी के रूप में तीन - चार मित्रों को कभी भी नहीं भुला पाया ! यूं तो छात्र जीवन में अनेकों मित्रों का सहयोग मिलता रहा ! प्रदीप माहेश्वरी, हर्ष माहेश्वरी, विनोद वर्मा,  बिजनौर से दिनेश अग्रवाल .... जिन्होंने अपने व्यवहार की अमिट छाप मेरे जीवन में छोड़ी और जीवन बदलता रहा ! 

 युवा काल में ही  सामाजिक संस्था " मानस " माहेश्वरी नवयुवक सभा के साथ आरंभ में ही जुढने का अवसर  मिला । देखते-देखते १०- १२ युवा मित्रों के साथ जुड़ गए !  तब क्या था जीवन का सामाजिक आनंद मिलने लगा !

       बड़े परिवार का सदस्य होने के नाते  बहुत सारे  अनुभव  यूं ही  मिलते रहे ! शिक्षा  में, व्यवसाय  में और सामाजिक क्षेञ  में !  राजनीति में रुचि - सामाजिक कार्यक्रमों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेना यह मेरे जीवन का अभिन्न अंग बन गया  ! कभी सोचता हूं आज छोटे परिवार का स्वरूप  जो हमारे सामने है जिसमें  बड़ो ने कहना छोड़ दिया  और छोटो ने सुनना ....... इस संवाद  हीनता  से सामाजिक ढांचे में बहुत बड़ा परिवर्तन दिखने लगा ! 

    छात्र जीवन का सबसे ज्यादा आनंद मुझे अपनी हायर एजुकेशन के दौरान  बिजनौर के वर्धमान कॉलेज से मिला !  वहां पर  अनाज मंडी  के बड़े व्यापारी के पुत्र  दिनेश अग्रवाल वहां मुझे एक मित्र एवं भाई के रूप में मिले । फिर क्या था... असफलता को सफलता में बदलते देखा ! 

जीवन भर में बिजनौर की भूमि का ऋणी रहूंगा !

     छात्र जीवन से राजनीति में रहने का अवसर मिला  तथा  उनका प्रतिनिधित्व  करने का भी अवसर मिलाता रहा  ! फिर बिजनौर से मेरठ , मेरठ से लखनऊ, लखनऊ से दिल्ली आ पहुंचा ! शेष भविष्य के आंचल .....आपका,  राकेश जाखेटिया दिल्ली से

100% LikesVS
0% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!