ग्राम टुडे ख़ास

जीवन की आस

डा.मधुबाला सिन्हा

हुआ आज ऐसा क्या जीवन
गहरे गमगीन हो आई है
कभी जो पतझड़ आते जीवन
कभी वसन्त की पुरवाई है

पत्ते एक एक लड़ते जूझते
झड़ तरु विहीन कर देते है
फिर भी मौज की लहर खड़ा
सारे दुःख वह सह लेते हैं

विह्वलता थम सी गई है जब
क्यों उघड़न दिल की दिखाते हो
पल पल कट जाते हैं जीवन
जो खुद से भी दुःख पाते हैं

सुख की चाह चेतना है रहती
दुःख को किनार क्यों करते हो
सुख-दुःख का सँग है आना-जाना
सँग यूँ हीं वे खेलते रहते हैं

गम की घटाएँ काली कल थी
आज बहार बन छाई है
हँस लो गा लो मौज मना लो
कट जाएगी यह जो तन्हाई है…..
★★★★★★

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