ग्राम टुडे ख़ास

जैसे मेरी पलकों पर

माला अज्ञात

ठहर गये कुछ भीगे सपने
जैसे मेरी पलकों पर
झिलमिलाते है कुछ मोती,
जैसे मेरी पलकों पर

न गिरते है न सूखते बस
मंजर धुँधला कर देते
साये सजा काट रहे कुछ,
जैसे मेरी पलकों पर

भूलकर भी नहीं भूलते जो ,
है कुछ ऐसें लम्हे
सजा रखा है उन लम्हों को,
मैने मेरी पलकों पर

आते आते आती है नींद
रोती जागी आँखोँ में
जागी रातें मीठी बातें ,
ठहर गई मेरी पलकों पर

सींच सींच सपनों की बगिया
पलकों की नमी से
उड़ेगी खुश्बू फूल खिलेंगे
कभी तो मेरी पलकों पर

बैठे है जो रुठकर हमसे,
ये दिल धड़काने वाले
बिठा रखा उनको अबतक ,
मैने मेरी पलकों पर

बाँध लिया अनजाना सा रिश्ता
बस दो ही पल में
उलझे हुये है वो दो पल,
अब भी मेरी पलकों पर

बीती रातें आती शामें
मन को छलती है पलपल
सपने फिर सजने लगे ,
आकर मेरी पलकों पर

याद आये जब इक साँझ
मीठी सी आवाज लिये
सज जाते है कितने सुर,
आके मेरी पलकों पर

न नींद है न सपने है
आधे जागे आधे सोये से
खूबसूरत पलकें उसकी,
झुकी है मेरी पलकों पर

   माला अज्ञात.....
  ग्वालियर म.प्र.
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