ग्राम टुडे ख़ास

तेज देवांगन की कलम से

वीर बन

जो टूटे ना वो तीर बन,
दुश्मनों के लिए शमशीर बन,
हालातो से लड़ कर तू,
जिंदगी से तू वीर बन।

गरजते है ये बादल तो,
चमकती है बिजलियां,
तू रुक नहीं तोड़ दे, सारे अर्चन,
तू ऐसा शूरवीर बन।

हालातो से जब जब जिसने भी,
लड़कर खून पसीना सींचा हैं,
दर्दों को कर किनारा ,
बनाया घर बगीचा है,

सहज भला यहां क्या मिला,
वनवास चौदह वर्ष प्रभु भी जाते है,
कर कर्म की लेख पे, दर्द पाकर,
वो रघु वीर कहलाते है।

चिराग

मैं चिराग बन जला ही क्या,मुझे बुझाने आ गए,
मेरे खाक को, नशले जहन मिटाने आ गए।
मैने तो चिंगारी बन जलना शुरू ही किया है,
मेरे दर पे मिट्टी बिछाने आ गए।।
मेहनत पसीने से मैंने, कर्म ज्योत जलाया है,
फिर क्यों मुझे खाक में मिलाने आ गए।
कितनी रातों के सफर से, हौलसा ये मुकम्मल मैंने बनाया,
मेरे हौसले को क्यों फिर डुबाने आ गए।
तपती धूप में मैंने, खुद को सींचा है,
फिर क्यों मेरे जहन आग लगाने आ गए।
क्या क्या खोया है मैंने, इस पल के लिए,
फिर क्यों मुझे रुलाने आ गए।
दो टूक रोटी की तड़फ मैंने देखी,
मन में चाह आंखों में तलब देखी,
देखी मैंने इस दुनिया दारी को,
देखी मैंने हर पल की लाचारी को,
फिर से क्यू मुझे डुबाने आ गए,
क्या बिगाड़ा मैंने तुम्हारा,
जो मुझे खाक में मिलाने आ गए।

100% LikesVS
0% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button
error: Content is protected !!