ग्राम टुडे ख़ास

तेरा साथ है कितना प्यारा

कुसुम तिवारी झल्ली

हूँ मैं बस एक दीवानी तेरी
दूजे को मैं क्योंकर जानूं
प्रतिपल हरपल तुमको चाहूं
किसी और को मैं ना पहचानूँ

दुनियाँ ने कब पहचाना था
मैं हूँ मोती कब जाना था
मैं बन्द पड़ी थी सीपी में
सूना जग मन अंधियारा था ,

भ्रम संशयः के अंधियारे को
जब तोड़ किरण तुम ले आये
अज्ञात ज्ञात चहुं ओर खिला
मैं सुरभि मृदुल तुम मुस्काये ,

इस जीवन के प्रांगण में अब
नर्तन करती खुशियां पलपल
तम दूर दुःसह चिर क्षीण हुआ
मन मुदित चपल उल्लास सरल ,

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