ग्राम टुडे ख़ास

पर्यावरण की व्यथा

प्रो(डॉ)शरद नारायण खरे

साँस थमने लगी,मर रही है हवा
दम घुटा जा रहा,मिल रही ना दवा
जीना दूभर हुआ,ख़़तरे में ज़िन्दगी,
पेड़ सब कट गए,अब बची ना दुआ।

देख लो आज तुम,क्या से क्या हो गया
खो गया चैन अब,सब अमन खो गया
कट गए वन,हरापन,सभी लुट गया,
कितना सुंदर था मेरा,वतन रो गया ।

 हम बढ़े आगे पर,पेड़ कटने लगे
बन गईं बिल्डिंगें,खेत घटने लगे
यह हुई ना ख़बर,हम रहे नींद में,
अपने हाथों ही हम,अब तो मिटने लगे।

पेड़ से दोस्ती,कोई करता नहीं
माँग धरती की कोई भी भरता नहीं
दर्द क़ुदरत का,बढ़ता ही तो जा रहा,
कोई भी इसकी पीड़ा को हरता नहीं ।

कहीं दरिया प्रदूषित है,कहीं तालाब हैं गंदे
कहीं है शोर डीजे का,कहीं पन्नी के हैं धंधे
कहीं है धूल और बढ़ता धुँआ,वाहन करें हल्ला,
हुये बहरे यहाँ,अंधे भी,देखो आज के बंदे।

                  -प्रो(डॉ)शरद नारायण खरे
                                प्राचार्य
         शासकीय जेएमसी महिला महाविद्यालय
                         मंडला(मप्र)

               

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