ग्राम टुडे ख़ास

“प्रभु ही सर्वोत्कृष्ट”


रंजना बरियार"  

बरगद की पत्तियों पर,
स्वाति की मचलती बूँदें,
छलछला रही हैं………..!
बरगद के घने काँधों पर
भोर की मीठी रश्मियाँ,
इठला रही हैं…………….!
कोयल की मधुर कूक संग,
ठंढी बयार की सरगम मिल,
तानपुरा बजा रही है………!
नवविवाहिता सी सजीली,
सुबह की रौशन सी पहर,
चमक दमक रही है………!
हैं मन मंदिर में प्रभु विराजे,
सजी है नैवेद्य संग पूजा थाल,
पूजा की घंटी बज रही है…..!
है सजी हुई आरती की थाली,
जल गये हैं दीप संग कपूर,
तन मन दमक रहा है……….!
हिल उठा है अनायास तनमन,
था क्या कोई वह दिवास्वप्न,
दिवा की दमक नहीं है…….?
है चहुँओर उजियारा ही पसरा,
नहीं कोई तिमिर का नजारा,
फिर कैसा ये सहर है………?
तम है कोई अदृश्य असुरों सा,
मचा रखा है त्राहिमाम सर्वत्र,
है जग का ये त्रासद……….!
भयाक्रांत नभ थल सारा भुवन,
है नहीं यह सृष्टि विनाशक,
प्रखर है विज्ञान…………..!
सर्व सर्वोत्कृष्ट हैं प्रभु पूज्य,
सृष्टि कर्ता जब हैं प्रभु पूज्य,
विनाशक कैसे असुर………?
समय है धीरे धीरे निकलेगा ही,
धरा के विचरते मनु-दानव का,
हो जाए जब संहार…………!
होगी वो सुबह प्यारी मद भरी
होगा वो धरा व्योम आलिंगन
प्रखर होगा विज्ञान…………!
है प्रभु ही सर्वोत्कृष्ट…………!

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