ग्राम टुडे ख़ास

प्रेम

नमिता स्मृति

कमल की सुप्त पंखुड़ियों पर
जब सुबह की धूप पड़ी
इक गुलाबी सी आभा
चहुँ ओर जैसे फैल गई


हल्की सी गर्माहट पा
पंखुड़ी जब खुलने लगी
पानी की लहरों पर मानो
बिजली सी गिरने लगी


सबनें देखा खिले कमल की
खिली खिली सी आभा को
पर जाना ना किसी नें उसमें
बंद भ्रमर की व्यथा को


धीरे- धीरे कली खिली
और चुपके से मुस्काई
सुप्त भ्रमर नें उठकर ली
फिर धीरे से अंगड़ाई


उसकी गुनगुन गुंजन से जब
गुंजरित हुई दशों दिशा
खिल कर कमल लगा मुस्काने
मानो कहे निज प्रणय कथा


पूछा सबनें भ्रमर से के
रात भर तुम कैद थे
फिर भी इतने खुश हो प्यारे
दिखते हो मदमस्त से


कहा भ्रमर नें तुम क्या जानो
प्रेम की परिभाषा क्या
कैद में रहकर ही प्रेम से
होता जीवन सार्थक सा


उसकी गुनगुन सुन कमल की
पंखुड़ी हुई सयानी
फैल गई फिर दशों दिशा में
प्रीत की नई कहानी


नमिता स्मृति
बोलांगीर ओडिशा

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