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फैशन की पढ़ाई कम खर्च में भी संभव है :मोनिका

मोनिका

राजेश कुमार सिन्हा

अगर मै यह कहूं की कला के क्षेत्र से मेरे जुड़ने का सिलसिला मेरे बचपन से ही शुरु हो गया था तो शायद यह गलत नहीं होगा।मेरा बचपन अपनी बुआ के घर गुजरा था।बुआ के पास सिलाई मशीन नही थी और वो सिलने का छोटा मोटा काम हाथ से ही किया करती थीं।मुझे याद है उन दिनो मै पांचवी मे पढ़ा करती थी और,मैने सिलाई की शुरुआत पिलो कवर के हाथ से सिलने से की थी।वह मेरे जिन्दगी की पहली सिलाई थी जिसे सभी ने भरपूर सराहा था।सच यही है कि कला के क्षेत्र में मेरी स्वाभाविक रुचि रही है।मै स्केच भी अच्छा किया करती थी।किसी भी चीज को देख कर उसे हुबहू उतार देना मेरे लिए बड़ा आसान था।कला से मेरा मतलब सभी क्षेत्र से है,मसलन डान्स,संगीत,कुकिंग,सिलाई,बुनाई,कढाई आदि और इन सभी चीजों मे मेरी समान रुचि रही है।हाँ,पर इसका मतलब यह नहीं है कि पढने में मेरी रुचि कम रही थी,बल्कि मै पढ़ाई में भी हमेशा अव्वल रही हूँ।थोड़े मे कहूं तो पिलो कवर सिलने से जो सिलसिला शुरु हुआ था वो आगे बढ़ने लगा था ।पर ज्यों ज्यों पढाई का बोझ बढ़ने लगा त्यों त्यों सिलाई की रफ्तार पर ब्रेक लगता गया।
सही मामले में बतौर फैशन डिजाइनर मेरे करियर की शुरुआत तब हुई जब मै शादी करके मुंबई आ गई।फिर एक साल बाद मेरी बिटिया तूलिक का जन्म हुआ,फिर तो मानो मेरे सपनों को पर लग गए।मुझे तो घर मे ही एक मॉडल मिल गई थी जिसके लिए मै लगभग रोज ही कुछ न कुछ नया और अलग सा ड्रेस बनाया करती थी जिसकी सभी प्रशंसा किया करते थे।जब मै मुंबई आई तो मैने अपने पति से एक सिलाई मशीन खरीदने को कहा और मैने अपनी पसंद बता दी की मुझे “फैशन मेंकर”ही चाहिए जिसकी लागत ज्यादा थी।पर शायद मेरे पति को इसका एहसास नही था कि मै प्रोफेशनल टाइप भी सिलाई कर सकती हूँ इसलिए उन्होने सिंपल सिलाई मशीन पर ही जोड़ दिया और मैने वही खरीद लिया।अब रोज कुछ न कुछ सिलाई करना मेरी आदत मे शुमार हो गया।मेरे पति मेरी भी मेरी सिलाई को देख कर खुश होते रहते थे।
अब मेरी बिटिया एक साल की हो चुकी थी,उसका जन्म दिन करीब था जिसे हम सब बहुत भव्य तरीके से मनाने की सोच रहे थे।मेरे पति की ख्वाहिश थी कि तूलिका के लिए” बर्थडे ड्रेस”किसी नामचीन शोरुम से लिया जाये।मै इसके पक्ष मे नही थी,मैने अपने पति से कहा की मै पहले खुद बनाती हूं,यदि अच्छा नही बना तो खरीद लेंगे।खैर,मेरे बनाये ड्रेस ने धूम मचा दी,सभी ने खूब सराहा और इस तरह मेरा हौसला और बढ़ गया।
तूलिका के जन्म दिन के दूसरे ही दिन मैने “फैशन मेकर”खरीद लिया।मेरे पति ने मुझे यह भी सलाह दी कि मुझे कोई फैशन डिजाईनिंग इन्स्टीटयूट मे ऐडमिशन ले लेना चाहिए ताकि लोग मुझे टेलर समझने के बजाए डिजाइनर समझें और मै प्रोफेशनल तरीके से काम कर सकूं।यह काम भी जल्दी ही हो गया और मै पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ साथ पढ़ाई भी करने लगी।यह मेरा आत्म विश्वास और मेरी मेहनत थी कि मैने फैशन डिजाईनिंग की पढ़ाई भी पूरी कर ली और मेरी पोजीशन भी अच्छी रही।इसी दौरान मैने “मोनिका क्रिएशनस”के नाम से अपना एक बुटीक भी खोल लिया और मै नियमित रूप से अपना एक्जीबिशन लोखंड़वाला मे लगाने लगी।
मेरे अन्दर कहीँ न कहीँ एक फैकल्टी बनने का शौक भी धीरे धीरे पनपने लगा था।इसकी वजह यह थी कि जब मै डिजाईनिँग की पढाई कर रही थी तो मेरे साथ पढने वाले अन्य स्टूडेंट्स कई चीजें मुझसे पूछा करते थे जिसें मै उन्हें बड़ी अच्छी तरह समझा दिया करती थी।वो मुझसे कह्ते भी थे कि आप तो फैकल्टी से भी बेहतर हो।शायद यही सोच कर मैने बतौर फैकल्टी एक फैशन इन्स्टीटयूट को ज्वाइन कर लिया और पढाने का सिलसिला शुरु हो गया।कुछ ही दिनो मे मै स्टूडेंट्स की नजरों में बेस्ट फैकल्टी बन गई।मैने दो तीन इन्स्टीटयूट मे पढ़ाया और हर जगह ऐसा ही फ़ीडबैक रहा,इससे मुझे यह तो समझ में आ गया कि अब मुझे क्या करना है।मैने सोचा कि अगर मेरा अपना इंस्टीटयूट होगा तो मै अपने हिसाब से फैशन डिजाइनर की नई पौध तैयार करूंगी जो कुछ अलग कंसेप्ट के साथ बाजार में आयेंगे।
मैने अपने पति से विचार विमर्श किया
और आनन फानंन जगह की तलाश शुरु हुई,,ईश्वर की दया से 2013 मे इन्स्टीट्यूटऑफ़ डिजाईनिंग ऐण्ड फैशन टेकनालाजी का पहला ब्रांच खुल गया।मेरी जिन्दगी का वो स्वर्णिम दिन था,मेरी मुराद पूरी हुई थी।
पर अब जिम्मेवारी बढ़ गई थी ।घर के काम काज के साथ साथ रोज बांद्रा से मीरा रोड का सफर,,,एडमिशन बढ़ाने की कवायद,और स्टूडेंट्स की रोजमर्रा की बढती अपेक्षाएं,,,,पर कह्ते हैं ना जहां चाह है वहां राह है ,,,यह सिलसिला मेरे रूटीन मे शामिल हो गया और गाड़ी पटरी पर दौड़ने लगी। इसी बीच फैशन शो भी आयोजित हुआ,और इन्स्टीटयूट की लोक प्रियता बढ़ने लगी।एक ब्रांच अन्धेरी में भी खुल गया।मुझे “बेस्ट ह्यूमेनटेरियन “का अवार्ड भी मिला।आज मेरे इन्स्टीटयूट से निकले बच्चे अच्छी जगहों पर काम कर रहे हैं।पर अभी भी बहुत कुछ करना है,बहुत सारी योजनाएं हैं जिन पर काम करना है।आम तौर पर यह धारणा बनी हुई है कि फैशन की पढ़ाई में बहुत खर्च होतां है पर मरा मानना है कि यह कम खर्च में भी बिलकुल संभव है।आज जब मै पीछे मुड़ कर देखती हूँ तो ऐसा लगता है कि ईश्वर ने मेरी मुराद पूरी कर दी है।पर शायद यह इसीलिये हो पाया की मुझे बचपन मे ही अपनी रुचि का पता चल गया था और मैने उस पर फोकस किया।पर शून्य से यहां तक की मेरी यात्रा आसान नहीं रही है,दूसरे शब्दों में कहूं तो किसी जंग से कम नहीं रही है।
प्रस्तुति

राजेश कुमार सिन्हा
मुम्बई

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