ग्राम टुडे ख़ास

बतरस

वीणा गुप्त

आओ बात करें,
अपनी कम,दूसरों की ज्यादा।
मैं तेरे विपक्षी को बुरा कहूँ
तू मेरे दुश्मन को पछाडे़।
मिट जाएँ सगब भेदभाव,
कलुष दूर हों अंतर के सारे।
आओ बात करें।

बतरस में लीन हो जाने की,
अपना-पराया भुलाने की,
यह आदर्श स्थिति ,
विरलों को ही मिलती है।
आँखे मन की खुलती हैं।
आत्मीयता  बढ़ती है।
आओ बात करें।

हमारी बातें हों ऊँची,
गहरा हो उनमें अर्थ।
चिंता हो उनमें दुनिया की
जिसका जीवन हो रहा व्यर्थ।

आओ बात करें
उस  मानवता की,
जो डूबने की कगार पर खड़ी है।
जिसे बचाने की चिंता बस हमें ही है
औरों को तो अपनी ही पड़ी है।
आओ बात करें।

बातें करें  हम देश सम्मान की,
नारी मुक्ति अभियान की।
बाल-उत्थान की,
लोक -कल्याण की,
मसीहा और भगवान् की
आओ बात करें।

राजनीति और धर्म की,
अनीति और अधर्म की,
सुकर्म और कुकर्म की,
मूल्यों के पतन की,
चरित्र के हनन की,
आओ बात करें।

सतयुग और त्रेता की,
नेता की,अभिनेता की,
विजित की,विजेता की,
युग को गति देने वाले,
महामानव ,युगचेता की।
आओ बात करें।

शिक्षा और संस्था की,
गली-सड़ी व्यवस्था की,
अच्छी बुरी अवस्था की
डगमगाती आस्था की,
रेशमी बंधन में जकड़ती,
भौतिकता की दासता की
आओ बात करें।

बातें हमारी हों
उपदेश भरीं,संदेश भरीं
दिखाएँ हम पूरी वाक्-चातुरी
शहद से भीगी हों,
मोम सी कोमल हों
पैनी हो धार इनकी
लक्षणा-व्यंजना की
चलाएँ ये मीठी छुरी।
आओ हम बात करें।

बातों का हिमालय खड़ा कर दें
लहराएँ बातों का अथाह सागर।
बह जाएँ बातों की त्रिवेणी में,
डूबें आकंठ ,उल्लास भर।
वीर बनें कागज के।
दिखाएँ बातूनी बहादुरी।
आओ बातें करें।

अच्छा होगा
यदि ,जान ले अगर हम

कि बातों ही बातों से,
न काम कोई बनता है।
बातों का छल,थोथा गर्जन
अंतत: मरण ही बनता है।

कर्म रहित बातें
बिन पाँख की उड़ान है।
रेतीले तट पर लहरों के निशान हैं।
आओ बात करें।

बातें करें ऐसी,
जिनमें हो कर्म का रंग
मन की उमंग,
वर्षा की सुगंध,
आशा की महक,
धूप की गमक,
निर्झर का संगीत,
चूड़ियाें की खनक,
जो हों दृढ़ता भरी,
विश्वास भरी।
वसंत की उजास भरीं।
आओ हम बात करें।

वीणा गुप्त
नई दिल्ली

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