ग्राम टुडे ख़ास

बस यूं ही….

किरण झा


आता नहीं तालमेल करना मुझे शायरी के बहरों का
बस यूं ही कुछ खेल खेला करती हूं मैं अल्फाजों का
कभी शब्द बिखर जाते हैं
कभी सिमटते हैं
कभी अधूरी कविता तो
कभी गीत बन जाते हैं
स्याही बिखराया करती हूं मैं अपने एहसासों का
बस यूं ही कुछ खेल खेला करती हूं मैं अल्फाजों का
तुलसी कबीर रहीम की तरह
अक्षरों में धार कहां से लाऊं
रामायण गीता वेदों जैसे
सार कहां से मैं पाऊं
पता नहीं क्यूं कैसे छप जाते शब्द मेरी भावनाओं का
बस यूं ही कुछ खेल खेला करती हूं मैं अल्फाजों का
कोशिश में अपनी गिरती हूं
और संभलती हूं
शब्दों के गुलदस्ते में ना जाने
कितने रंग संजोती हूं
महकेगी इक दिन बगिया इंतजार है रंग बिरंगे फूलों का
बस यूं ही कुछ खेल खेला करती हूं मैं अल्फाजों का

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