ग्राम टुडे ख़ास

बाल भिक्षुक एक सामाजिक व्यथा

सुषमाश्रीवास्तव

साथियों  समाज में कितने दर्द गुथे हुए हैं जिनकी गणना करना भी मुश्किल सा ही लगता है।तो चलिए आज उन्हीं में से किसी एक पर आज चर्चा कर ली जाए, यदि कर सकते हैं तो उसके निदानात्मक कुछ प्रयास भी करें तो बेहतर होगा।
       सड़कों पर भीख मांगते बच्चों को लगभग हम रोज ही देखते हैं। कई लोग उन्हें कुछ पैसे देते हैं तो कुछ लोग ऐसा न करने की नसीहत

देकर चलते बनते हैं। वहीं, कुछ लोग उनकी इस हालत के लिए सरकार को कोसते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि लगभग हर प्रदेश में भिक्षावृत्ति को रोकने के लिए सरकारी स्तर पर विभाग भी हैं और योजनाएं भी। इतना ही नहीं ज्यादातर शहरों में भिक्षुक गृह भी बने हैं, लेकिन उनमें से अधिकतर खाली ही हैं। ऐसे में कई लोगों ने बाल भिक्षावृत्ति रोकने के लिए एक अनोखे अभियान की शुरुआत की है। किसी ने पूरे देश में हजारों किलोमीटर की पदयात्रा कर इसे रोकने के लिए लोगों को जागरूक करने का पुण्य कार्य किया है । जो न बताते हैं कि वह कक्षा छह से ही वृद्धाश्रम जा रहे हैं। जल्द ही उन्हें अहसास हो गया कि इस समस्या की जड़ बच्चों में ही है। अगर बच्चे ही खुश नहीं होंगे तो बुजुर्ग कैसे सुखी रह सकेंगे। सड़कों पर हजारों बच्चे भीख मांगते दिख जाते हैं, लेकिन कोई उनके लिए कुछ नहीं करता है। वे महानुभाव उनके लिए कुछ करना चाहते थे। लेकिन पता था कि व्यक्तिगत रूप से 50 से 100 बच्चों से ही मिल सकते हैं, इसलिए उन्होंने अपने लक्ष्य को पाने के लिए पूरी युवा पीढ़ी को जोड़ने का प्रयास किया। और अभी उनका प्रोजेक्ट सक्रियता से ही चल रहा है।
ऐसे ही मेरे जानकारी में युवा महिला है जो अपनी दैनिक उत्तरदायित्वों को निभाते हुए भी शहर के, तथा आस पास के इलाकों से भीख मांगते बच्चों को पकड़ पकड़कर ले जाती हैं और सांध्यकालीन कक्षा लगा कर पढ़ना लिखना सिखाती हैं तथा जीवन को अच्छी तरह से जीना और उसका लाभ बताती हैं। आलम यह है कि शहर के बाल भिक्षुक उन्हें पहचानने लगे हैं। परिणामतः कुछ तो उन्हें देख कर छिपने का प्रयास करते हैं तो कुछ स्वयं अपने साथियों को लेकर उनके पास आते हैं।
                आज आवश्यकता है इस प्रकार की जागरूकता लाने की न कि छींटाकशी करने की।
यदि आपको अपने देश और समाज से तनिक भी सहानुभूति है तो आगे आइए, हर असंभव संभव हो जाता है।केवल कमियों को उजागर करना उनको बुरा-भला कहना ही पर्याप्त नहीं है उसका निदान भी करना होगा।एक  एक कदम आगे बढ़ाना होगा।यदि एकाकी कुछ नहीं कर सकते तो ऐसे लोगों से कदम मिलाना होगा। उनकी किसी भी प्रकार की, जो आपसे हो सके,सहायता करनी होगी तभी मनोवांछित परिणाम की राह प्रशस्त हो सकेगी।
यह समाज हमारा है इसे यदि बिगाड़ा जा सका है तो बनाया/सुधारा भी जा सकता है। सच मानिए मुश्किल अवश्य लगता है पर असंभव नहीं है।जरा बढ़कर तो देखिए,हाँथ से हाँथ मिला कर तो देखिए ।आपका देश, आपका समाज किसी से कम नहीं है उसे कमतर आंकने की भूल न करें। उसे बेहतरी की राह पर ले जाने के लिए अंजुरी भर प्रयास अपना भी डालें और आस-पास को भी प्रेरित करें। निश्चित मानिये कि 1 और 1 -11 -फिर 111 और 1111 ही होंगे शनैः शनैः आगे ही बढ़ना है, पीछे नहीं लौटना।उम्मीद अवश्य फलीभूत होकर रहेगी यह मेरा विश्वास है।
       लेखिका –
              सुषमा श्रीवास्तव
उत्तराखंड

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