ग्राम टुडे ख़ास

बुढ़ापा

संगीताश्रीवास्तव

जिन्दगी की चादर घिस सी गई है,
अब जाके मखमली सिरहाने मिले हैं।

उम्र भर महल ख्वाबों के कितने बने,
अंत मे एक कमरा ही ठिकाने बने हैं।

चलचित्र के सहारे ढल रही जिन्दगी,
मुस्कुराने के यही बहाने मिले हैं।

वक्त जैसे रुक सा गया है यारों,
उम्र के इस मोड़ पर आकर।

लगता है कुछ छूट सा गया है,
इस आपाधापी मे दौड़ लगाकर।

बचपन के खेल ने जवानी का शौक कहा,
जवानी ने काम के जूनून मे शौक को दरकिनारे किया,

अब बुढ़ापा बन गया हड्डियों का ढांचा
शौक ने कहा तू मुझसे मैच नहीं खाता

बूढ़े शेर पर तो चूहा भी गुर्रा के चला जाता,
इतना ही रह गया नई पीढ़ी से अपना नाता।

बच्चे इन्तजार करके सो जाते थे तब मैं घर आता

आज मैं राह तकता हूं बच्चों का आना पता नहीं लग पाता।

आखें पढ़ती थी मन की भाषा तब कलम को फूर्सत नहीं थी,
आज कलम लिखना चाहे तो आखों मे वो नजऱ नहीं।

नदी के दूसरे छोर तक पहुंच गया हूं
बस कर्मों की पतवार के सिवा कुछ साथ नहीं।

     संगीता श्रीवास्तव

शिवपुर वाराणसी यू.पी.

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