ग्राम टुडे ख़ास

मत रहो बस सपनों के भरोसे

श्रीकांत यादव

सुखमय जीवन की तन्मय निद्रा में,
बन पूर्णिमा सपनों मे आना |
अमावस जीवन का गाढा करने,
थोथी बदली सी मत छाना ||

चांद सितारे जीवन भाग्य के,
अकारथ रहते गर्दिश बनकर |
सुखद स्वप्न की अभिलाषा में,
कर्तव्य निभाओ जी भरकर ||

केवल अच्छाई को याद करो,
दुख की बदली का प्रतिकार करो |
पंक रहित जीवन कल्पना में,
सत्कर्मों का ही मनुहार करो ||

कुछ पाथेय नहीं जीवन यात्रा में,
याचक बनना स्वीकार नहीं |
काया मिट्टी की मिट्टी बन जाए,
हां सैलावों पर अधिकार नहीं ||

सुखमय सपनों के मोह पाश में,
कौन जगता है झपकी ले ले |
खुशहाल गमकती संदली हवा में,
कौन न सोए खिड़की खोले ||

असीम ऊर्जा ले नए सवेरे,
पथ संचलन जीवन के करते |
मरघट की मर्मांतक लपटों से,
कहो किस घर में चूल्हे जलते ||

स्वर्ग धरा पर उतर सकता है,
सच सपने से झोली भर लें तो |
शबनम मोती कैसे हो सकती ,
तृण बबूल की खेती कर लें तो ||

शौर्य का चकमक कर्म की ऊर्जा,
सच साबित करते सपने को |
दिवा स्वप्न बन रह जाता वह,
सके न साथ कर्मबल अपने को ||

बरदान और मनोरथ के बल ,
जीवन के सपने संवर सकते हैं?
रात झोपड़ी दिन को महल में,
कृष्ण सुदामा की ही कर सकते हैं||

पौरुष पर्वत को मसल सकता है,
सब सधता नहीं भुजबल से |
यदुवंशी बुध्दि हो प्रबल प्रखर,
सब मिलता यहीं मनोबल से ||

स्वर्ग धरा पर विराजमान यहीं,
नर्क भी यहीं पर अविचल है |
अपनी प्रज्ञा विकसित कर लो,
ज्ञानी अकेला ही दलबल है ||

श्रीकांत यादव
(प्रवक्ता हिंदी)
आर सी 326, दीपक विहार
खोड़ा, गाजियाबाद
उ०प्र०!

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