ग्राम टुडे ख़ास

माता सीता का हरण

महेन्द्र सिंह “राज”


एक बार पंचवटी में गई सुपनखा कुटिया पास।
देख राम को भई मुदित मन में उपजी काम आस।।

तव समान ना मानव जग में मम समान ना नारी।
आओ दोनों परिणय कर लें अब तक हूं मैं क्वांरी।।

राम ने सीता को देखा सुपनखा से फरमाए।
लक्ष्मण लघु भ्राता से कर लो अगर पसन्द वोआए।।

होकर परेशान सुपनखा माता सीता पर झपटी।
यौवन में मतवाली थी वह अरू स्वभाव से कपटी।।

श्री रामसे आज्ञा पाकर लक्षमण ने काटे नाक कान।
रोती चिल्लाती सुपनखा पहुंची खर दूषण के धाम।।

रोकर बोली खर दूषण से तेरे जीवन को धिक्कार।
नाक कट गई बहना की करो राम पर भीषण वार।।

संग में उसके एक नारि त्रैलोक सुन्दरी है सुकुमारि।
रामलखन को मार युद्ध में उसे बना लो अपनी नारि।।

श्री रामचन्द्र अरु खर दूषण में भीषण संग्राम हुआ।
खर दूषण दोनों खेत रहे सेना का काम तमाम हुआ।।

सुपनखा ना हुई निराश पहुंची रावण के दरबार।
सारा हाल बयान किया रावण से भी खाई थी खार।।

बहन की ऐसी दशा देख दशासन का खुन खौल उठा।
सीता को पटरानी बनाने को उसका मन डोल उठा।।

रावण समझ न पाया सुपनखा चल रही कुटिल चाल।
ले रही पति के वधका बदला बन जाएगी उसकी काल।।

रावण मन सोच विचार कर गया मामा मारीच के पास।
मारीच वेश बदलने का हुनर रखता था बहुत खास।।

रावण बोला मारीच से तुम्हें कनक हिरन बन जाना है।
राम को दिग्भ्रमित करो तुम सीता को हर कर लाना है।।

मारीच नहीं तैयार हुआ वह राम के बल को जाना था।
सुबाहु ताड़का संग रण में श्री राम को पहचाना था।।

दशासनकी धमकी सुन मृग राम को ठगना ठानलिया।
रावण हाथों मरने से राम के हाथों मरना मान लिया।।

कनक हिरन बन मामा मारीच पंचवटी को नियराया।
देख सुनहले हिरन को मां सीता का मन ललचाया।।

श्री राम से बोली हे आर्य! मुझको इसका चर्म चाहिए।
बदल में इसके सुनने को मुझको दूजा ना मर्म चाहिए।।

नियति ने कुछ और लिखा था श्री रामने बहुत समझाया।
पर भाग्य में और बदा था सीता जी को समझ न आया।।

लक्ष्मण को देकर ताकीद धनुष बाण ले श्री राम चले।
कभी आगे कभी पीछे होते कनक हिरन के साथ चले।।

लगा निशाना छोड़ा तीर स्वर्ण हिरन के लगा शरीर।
हा लक्ष्मण हा लक्ष्मण बोला छूट गया उसका शरीर।।

हा लक्ष्मण हा लक्ष्मण सुनकर सीता का मन घबराया।
सहायतार्थ लक्ष्मण को शीघ्र जाने का आदेश सुनाया।।

पर लक्ष्मण तैयार न थे परिचित थे श्री राम की माया से।
पर मजबूर हुए जाने को कटु वचन सुन अग्रज भार्या से।।

परित:कुटिया खींची रेखा अग्निमंत्र से भाभीको समझाए।
यह अभिमंत्रित रेखा पार न करना चाहे कुछभी हो जाए।।

कुटिया में केवल देख सिया को रावण ने दाव लगाया।
विप्र भिखारी रुप बना सिय सम्मुख भीख मागने आया।।

भिक्षाम् देहि भिक्षाम् देहि कह कुटिया के सम्मुख आया।
देख छवि माता सीता की मन ही मन ललचाया,घबराया।।

देने भिक्षा मां बाहर आई ना समझ सकी रावण की चाल।
बंधी हुयी भिक्षा नालूंगा कह रावणने फेंका कपटी जाल।।

मैं हूं शंकर का भक्त अटल देता हूँ तुमको अटल शाप।
रेखाबाहर आकर भिक्षादो या भस्महोगी सपरिवार आप।।

देख रावण का दुर्वासा रूप मां सीता मन ही मन घबराई।
भिक्षा देने के लिए ज्योंही अभिमंत्रित रेखासे बाहर आई।।

हाथ पकड ले खींच उठा वह राक्षस विमान तक भागा।
माता की ऐसी हालत देख चहंचहां उठे खग पक्षी कागा।।

बिठा विमान ले उडचला भयभीत मनसे दक्षिण की ओर।
मिला जटायु राह में उसको ,ललकारा कहां भागता चोर।।

हुआ भयंकर युद्ध अम्बर में परहीन जटायु गिरा जमीं पर। आगेचल कुछदेख जनोंको फेंके कनक किष्किंधा ऊपर।।

सिंधु पार कर रावण पहुंचा लंका में वाटिका अशोक।
बहुत दुखी थी माता सीता अपार भरा उनके मन शोक।।

महेन्द्र सिंह “राज”
मैढीं चन्दौली उ. प्र.
9986058503**

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