ग्राम टुडे ख़ास

मानसी मित्तल की कलम से

कशमकश

कश्मकश भरी है कुछ यूं ज़िंदगी,
कभी हँसाती है तो कभी रुलाती है ये ज़िंदगी।
मन कभी उदास होता है तो कभी चंचल,
ज़िंदगी यूँ ही चल रही है हरपल।
जीने का तो बस यही है सबब,
जाने नही कोई कब ,क्या ,होगा ?
यही कहता हैआने वाला कल।
यूँ ही बनी रहती है ज़िंदगी पहेली सी,
न जाने कब बन जाती है सहेली सी।
दिल कुछ कहता है, दिमाग कुछ कहता है,
पल में कुछ ,ऐसा मुझे लगता है।
दिलोदिमाग में न जाने
क्या क्या फ़ितूर चलता है।
मुरझा जाता है दिल
ग़मों के पलों में,
बेरंग सी हो जाती है
ज़िंदगी कुछ ही क्षणों में।
छंट जाते हैं ज़ब ये बादल,
तब क़दम रखती है
खुशियों की दहलीज़ में।
अतः ज़िंदगी दुख़ सुख़ का है मेला,
यंही अहसास बनाता है इंसान को अलबेला।
कश्मकश भरी ज़िंदगी में ,
इंसां जीवन ज़ीता है अकेला।

आओ रे ..बरसो मेघा प्यारे

आओ रे ..बरसो मेघा प्यारे,
घुमड़ घुमड़ कर बदरा कारे।

धरा तपिश से हो रही व्याकुल,
वन उपवन वर्षा को आतुर।
ठंडी ठंडी वर्षा की बूंदों से,
भूमि को तुम शीतल कर दो।
आओ रे ….
तुम बिन खेत खलियान हैं सूखे,
क्यों तुम हो कृषक से रूठे??
ढूंढ रही हैं प्यासी अखियाँ ,
इन अखियों की प्यास बुझा दो।
आओ रे …..

चातक ,पक्षी ,मोर, पपीहा,
सब गर्मी से झुलस रहे हैं।
सूखे नदी, तड़ाग ,सरोवर,
अपनी वर्षा से पावन कर दो।
आओ रे ….

कोयल काली कुहूक रही हैं,
अमुआ की डाली सुख रही हैं।
जीव ,जंतु इस भीषण गर्मी में,
अपने रहम की वर्षा कर दो।
आओ रे …..

नटखट हो तुम कारे बदरा,
लगाके आते नयनों में कजरा।
अब तो प्यारे मेघा बरसो,
अपनी वसु की झोली भर दो।
आओ रे मेघा….

पर्यावाची रूप में पर्वत का अस्तित्व

पर्वत कहूँ या हिम तुझे ,पहाड़ कहूँ या शिखर तुझे।
अस्तित्व है तेरा प्रचंड ,धरणीधर है तू भीषण।

पर्वत है तू बड़ा विशाल,बहती है नदियों की धार।
जीव जंतु का है यही निवास,ऋषि मुनियों का भी होता वास।

जंगल का तू नागपति ,महीधर है तू अचल, गिरी।
भूधर तेरा जग में नाम,महादेव का ये है धाम।

कृष्ण की देखो अद्भुत लीला,शैल, अद्री को वश कर लीना।
पलभर में कनिष्ठ पे लीना,तुंग ने सबका दुख हर लीना।


मानसी मित्तल
शिकारपुर
जिला बुलंदशहर
उत्तर प्रदेश

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