ग्राम टुडे ख़ास

मुझे लौटा दो


कल्पना भदौरिया “स्वप्निल “

तुमने मुझसे जो छीना , वो मेरा प्यार मुझे लौटा दो

अच्छा नहीं है भीड़ में खोना, वो मेरा एकांत मुझे लौटा दो

गला न घोंटो मेरी ममता का , मैं हूँ तेरी कोई गैर नहीं

मुझसे न तोड़ो नाता , जीवन हूँ तेरी कोई गैर नहीं

मेरी हरियाली जो छीना , वो मेरा श्रंगार मुझे लौटा दो

अच्छा नहीं है भीड़ में खोना , वो मेरा एकांत मुझे लौटा दो

मुझ पर खड़े हो इंद्रधनुषी , नज़ारे देखें है तुमने

मस्त पवन के झोंके, कल कल निनाद करते पानी के झरने

फूलों के रस का चुनना , वो मेरा झुंड भ्रमर मुझे लौटा दो

अच्छा नहीं है भीड़ में खोना, वो मेरा एकांत मुझे लौटा दो

निश्चित ही जहाँ की तस्वीर बड़े जतन कर तुमने बदली

घर तो सुन्दर बना लिया पर पवन हुई जहरीली

सन सननसन चलती पुरवाइया,वो मेरा सम्मान मुझे लौटा दो

ग्रहों की शांति मैं प्रकति तुम्हारी , तुम्हें जीवन देने वाली

कर न पाए संरक्षण मेरा जिससे होती मुख पर तेरे लाली

वृक्षारोपण सेसंवारो मेरीकाया,वो मेरा अस्तित्व मुझे लौटा दो

अच्छा नहीं है भीड़ में खोना , वो मेरा एकांत मुझे लौटा दो

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कल्पना भदौरिया “स्वप्निल “
उत्तरप्रदेश

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