ग्राम टुडे ख़ास

मुम्बादेवी की बर्फी नहीं खाई तो धरती पर आना ही व्यर्थ हुआ….

डॉ रमाकांत क्षितिज

आप कभी बनारस जाएं और कचौरी गली की कचौड़ी न खाएं,मथुरा जाएं और मथुरा का पेड़ा न खाएं,धारवाड़ जाएं और मिश्रापेड़ा न खाएं,जौनपुर जाएं और एटमबम न खाएं,अमेठी जाएं और कोहड़ा की तरकारी पूड़ी न खाएं,यह सब तो चल जाएगा और कोई बड़ी हानि नही हुई, यह आप समझ सकते हैं।लेकिन मुंबई आएं मुंबादेवी न जाएं,वहां जाकर भी मुंबादेवी का प्रसाद वहां की बर्फी न खाएं ,फिर तो धरती पर आना जन्म पाना ही व्यर्थ गया,ऐसा मैं समझता हूं।पूरे देश में तरह तरह की चीजें खाने पीने के लिए मशहूर हैं। सौभाग्य से देश के धार्मिक स्थलों में बहुत जगह जाने का मौका भी उनकी कृपा से मिला ही है। परंतु मुंबई की मुंबादेवी के जैसी स्वादिष्ट बर्फी मुझे और कहीं खाने नही मिली है।इस बर्फी में हलाकि कोई विशेष चीज़ नही डाली होती,सिर्फ चीनी और कुछ चीजें ही होती होंगी,परन्तु गज़ब का स्वाद।बचपन में जब कभी मुम्बादेवी जाता ,या जाने का प्रोग्राम बनता घर में,तो बर्फी को याद कर ही मुंह में पानी आ जाता।भांडुप से लेकर मन्दिर पहुँचने तक दिमाग में बर्फी कब मिलेगी,कितनी जल्दी मिलेगी यही सब चलता रहता। वहाँ पहुँचने पर दर्शन की इतनी जल्दबाजी रहती कि, कब दर्शन हो और बर्फी खाने को मिल जाय।अधिक भीड़ होने पर मन कचोट कर रह जाता।काश तुरन्त आएं ,तुरन्त दर्शन और तुरन्त बर्फी मुँह के अंदर।कभी कभी तो लगता क्यों न पहले बर्फी ही खा लें,फिर दर्शन।आज भी जब कभी जाता हूं,बर्फी को लेकर मेरा बचपना बिलकुल नही गया है।दर्शन के तुरंत बाद मुँह में बर्फी होनी ही चाहिए।कभी जब घर में बर्फी मुंबादेवी वाली आ जाती है।तब कई बार रात में भी फ्रिज से निकलकर चुपके से खा ही लेता हूँ। शुगर के कारण मीठा खाने पर घरवालों की नज़र मुझपर रहती ही है। पर मुंबादेवी की बर्फी घर में हो और जिहवा उससे अलग,यह हो नही सकता।इस बर्फी में क्या है,मुझे पता नही,स्वाद रूप में मां का आशीर्वाद उसमें विराजमान है।आज भी कल्याण में रहते हुए,जब कभी मुंबादेवी मन मस्तिष्क में आती है,तो बर्फी तुरंत आ ही जाती है।अपने आप को रोक नही पाता ।मां की ही कृपा है,यहाँ कल्याण में एक पंडित जी हैं ,जो मुंबादेवी रोज जाते हैं। कभी कभी उनसे वहाँ की बर्फी मंगाकर आज भी खूब खाता हूं।घर के सभी लोगों को यह बर्फी बहुत पसंद है।पर इस बर्फी के मामले में मैं बर्फी को लेकर,सबसे बड़ा सदस्य होने के बावजूद, सबसे छोटा सदस्य हो जाता हूँ। इस बात का खयाल घरवाले भी रखते हैं । मेरे हिस्से ही बर्फी का बड़ा हिस्सा आता है।इसके लिए परिवार जनों और पण्डित मनीष दुबे जी का विशेष आभार।जिनके कारण यह अमृत तुल्य बर्फी गाहे बगाहे खाने को मिल जाती है।यह प्रसाद रूप में होकर सबसे स्वादिष्ट हो जाती है। इसकी तुलना मैं संसार की किसी मिठाई से नही कर सकता। यही एक चीज़ है,जिसे अब चुराकर वह भी अपने ही घर में, मैं खाता हूं। अकसर पकड़ा भी जाता हूँ।चूंकि सोचता हूं,ज़रा सा खा लूं।पर ज़रा सा वह भी यह बर्फी,नामुमकिन। बड़ा हिसा ही गायब करता हूँ। चोरी की जगह डकैती हो जाती है,बर्फी के डिब्बे पर,तब तो पकड़ा जाना तय ही है।पकड़े जाने पर खीसनिपोर देता हूं।घर में सभी इस खीसनिपोर की हरकत पर नाराज़ नही होते।मेरे प्रति बर्फी को लेकर दयाभाव ही रखते हैं।जय हो मुम्बादेवी की,जय हो वहाँ की बर्फी की,मां का प्रसाद मिलता रहे। ऐसा दिन भी आए, कि हम सब फिर उसी भीड़ भाड़ से मुंबादेवी का दर्शन कर पाएं।कोरोना रूपी संकट मानवता पर से टल जाए।

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