ग्राम टुडे ख़ास

मेरा अरमान तुम हो

तृष्णा चक्रवर्ती

तुम किताब हो या एक पन्ना,
लेकिन मुझे तुम्हारे अल्फ़ाज़ों में है रहना,
चाहे तुम चुप हुए या हुए एक सितारा,
जब किताब के पन्नों का मैंने पलटा किनारा,
याद आती है मुझे हमारी हर तमन्ना,
बहुत सालों बाद मैंने देखा तुम्हारा यह जमाना,
आज देखो किस ओर हवा चली है,
तुम्हारे नैनों से न जाने क्यों जलधारा बही है,
वो बीच का पन्ना मेरे प्यार की निशानी है,
उस किताब पर जमी वो धूल पुरानी है,
आज वो चाय की प्याली हाथ लिए,
खिड़की के पास थी मैं लिए बालों को खुले,
होठों से शब्द नहीं निकले तुम्हारा साथ कुछ ऐसा लगा,
मेरे दिल का मिज़ाज़ भी आज कुछ बहका लगा,
तुम किताब नहीं मेरी जान हो,
मेरा दिल नहीं मेरे अरमान हो।

©

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