ग्राम टुडे ख़ास

यात्रा संस्मरण

पूनम शर्मा स्नेहिल


बात उन दिनों की है । जब अनामिका 6 साल की थी । अनामिका अपने परिवार में मम्मी पापा दो भाई संग रहती थी। दादा-दादी और बुआ अहमदाबाद में रहती थे। अनामिका की तीन बुआ थी । जिनमें से बीच वाली बुआ उसे बेहद ही प्रिय थी। मुझे आज भी याद है । उस वर्ष बेबी बुआ की शादी हुई थी । बेबी दुआ हांँ यही नाम था। अनामिका की चहेती बुआ का। जान छिड़कती थीं दोनों एक दूसरे पर ।

शादी के बाद , बेबी बुआ अपने ससुराल और अनामिका अपने मांँ बाप के साथ उत्तर प्रदेश की तरफ चली गई। दिन बीते रहे ।अनामिका को यह भी याद नहीं कि उनकी शादी कब हुई थी । उस वर्ष रक्षाबंधन पर दादा जी और छोटी बुआ अनामिका के घर आए हुए थे । रक्षाबंधन मनाने के लिए बेबी बुआ ने एक बड़ी सी राखी पापा के लिए भेजी थी ,राखी बहुत ही सुंदर थी। अनामिका को सुंदर लगती थी, क्योंकि बेबी बुआ ने जो भेजी थी । दुनियाँ की हर बातों से अनजान एक अलग अहसास में जिया करती थी अनामिका बेबी बुआ के साथ । मानों उसकी खुशी थी बेबी बुआ। बेबी बुआ का असली नाम लक्ष्मी हुआ करता था। परंतु उस वर्ष ना जाने विधि के विधान को क्या मंजूर था। रक्षाबंधन से 2 दिन बाद सुबह-सुबह एक फोन आया। तब तक अनामिका स्कूल जा चुकी थी। उस फोन की घंटी और जो खबर पता चली अनामिका उससे बिल्कुल अनजान थी । बेबी बुआ दुनिया छोड़कर जा चुकी थी ।अनामिका के पिताजी ने ऑफिस में काम कर रहे एक भैया को अनामिका को स्कूल से लाने के लिए भेजा । अनामिका स्कूल में स्टेज पर प्रेयर करवा रही थी , तभी प्रिंसिपल ने पीछे से आकर अनामिका को पकड़ा । थोड़ी देर के लिए अनामिका डर सी गई थी। उससे कोई गलती हो गई क्या जो प्रिंसिपल ने उसे प्रेयर के बीच से ही पीछे खींच लिया । अनामिका सहमी सी प्रिंसिपल के बगल में खड़ी थी। प्रिंसिपल ने अनामिका से पूछा । क्या तुम इन्हे पहचानती हो ? भैया को संकेत करते हुए ।
अनामिका ने कहा हांँ जानती हूंँ। यह मेरे पापा के ऑफिस में काम करते हैं। प्रिंसिपल ने अनामिका से कहा क्लास से अपना बैग ले आओ तुम्हें घर जाना है । अनामिका सभी बातों से अनजान चुपचाप अपना बैग लेकर आई और भैया के साथ घर पहुंँची ।
घर में सामान पैक हो रहे थे, क्योंकि अहमदाबाद जाना था। वहांँ जहांँ बुआ मौजूद थी। मृत शरीर के रूप में । घर में सभी जानते थे कि अनामिका बेबी बुआ को कितना पसंद करती है इसीलिए किसी ने अनामिका को कुछ नहीं बताया । अनामिका को बस इतना बताया गया था कि अहमदाबाद जाना है ।

यात्रा संस्मरण****************बात उन दिनों की है । जब अनामिका 6 साल की थी । अनामिका अपने परिवार में मम्मी पापा दो भाई संग रहती थी। दादा-दादी और बुआ अहमदाबाद में रहती थे। अनामिका की तीन बुआ थी । जिनमें से बीच वाली बुआ उसे बेहद ही प्रिय थी। मुझे आज भी याद है । उस वर्ष बेबी बुआ की शादी हुई थी । बेबी दुआ हांँ यही नाम था। अनामिका की चहेती बुआ का। जान छिड़कती थीं दोनों एक दूसरे पर । शादी के बाद , बेबी बुआ अपने ससुराल और अनामिका अपने मांँ बाप के साथ उत्तर प्रदेश की तरफ चली गई। दिन बीते रहे ।अनामिका को यह भी याद नहीं कि उनकी शादी कब हुई थी । उस वर्ष रक्षाबंधन पर दादा जी और छोटी बुआ अनामिका के घर आए हुए थे । रक्षाबंधन मनाने के लिए बेबी बुआ ने एक बड़ी सी राखी पापा के लिए भेजी थी ,राखी बहुत ही सुंदर थी। अनामिका को सुंदर लगती थी, क्योंकि बेबी बुआ ने जो भेजी थी । दुनियाँ की हर बातों से अनजान एक अलग अहसास में जिया करती थी अनामिका बेबी बुआ के साथ । मानों उसकी खुशी थी बेबी बुआ। बेबी बुआ का असली नाम लक्ष्मी हुआ करता था। परंतु उस वर्ष ना जाने विधि के विधान को क्या मंजूर था। रक्षाबंधन से 2 दिन बाद सुबह-सुबह एक फोन आया। तब तक अनामिका स्कूल जा चुकी थी। उस फोन की घंटी और जो खबर पता चली अनामिका उससे बिल्कुल अनजान थी । बेबी बुआ दुनिया छोड़कर जा चुकी थी ।अनामिका के पिताजी ने ऑफिस में काम कर रहे एक भैया को अनामिका को स्कूल से लाने के लिए भेजा । अनामिका स्कूल में स्टेज पर प्रेयर करवा रही थी , तभी प्रिंसिपल ने पीछे से आकर अनामिका को पकड़ा । थोड़ी देर के लिए अनामिका डर सी गई थी। उससे कोई गलती हो गई क्या जो प्रिंसिपल ने उसे प्रेयर के बीच से ही पीछे खींच लिया । अनामिका सहमी सी प्रिंसिपल के बगल में खड़ी थी। प्रिंसिपल ने अनामिका से पूछा । क्या तुम इन्हे पहचानती हो ? भैया को संकेत करते हुए ।अनामिका ने कहा हांँ जानती हूंँ। यह मेरे पापा के ऑफिस में काम करते हैं। प्रिंसिपल ने अनामिका से कहा क्लास से अपना बैग ले आओ तुम्हें घर जाना है । अनामिका सभी बातों से अनजान चुपचाप अपना बैग लेकर आई और भैया के साथ घर पहुंँची ।घर में सामान पैक हो रहे थे, क्योंकि अहमदाबाद जाना था। वहांँ जहांँ बुआ मौजूद थी। मृत शरीर के रूप में । घर में सभी जानते थे कि अनामिका बेबी बुआ को कितना पसंद करती है इसीलिए किसी ने अनामिका को कुछ नहीं बताया । अनामिका को बस इतना बताया गया था कि अहमदाबाद जाना है ।अनामिका की खुशी का ठिकाना नहीं था। क्योंकि उसे यह पता था कि बेबी बुआ वहांँ मौजूद है ।अनामिका अपने आप में खुशी में मगन होकर घूम रही थी। घर में रोने धोने का माहौल था, पर अनामिका को उसने कुछ समझ नहीं आ रहा था । उसे तो बस इस बात की खुशी थी कि वह अपनी बुआ से मिल पाएगी। रास्ते भर सभी रोते रहे । पर अनामिका अपनी ही दुनिया में मुस्कुरा रही थी । सफर 24 घंटे का था रास्ते भर सभी रो रहे थे और अनामिका अपने आप में खुश थी ।वह समझ ही नहीं पा रही थी कि घर जाने के लिए सभी इतना रो क्यों रहे हैं वो तो अंदर ही अंदर बस इस बात की खुशी मना रही थी कि वह बेबी बुआ से मिलने जा रही है। जब अहमदाबाद स्टेशन पर सभी उतरे तो रिक्शे में बैठ सभी लोग रो रहे थे। पर एक अनामिका ही थी जो यह समझ नहीं पा रही थी कि आखिर सभी क्यों रो रहे हैं। उसे तो बस इतना समझ आ रहा था कि वह अपनी बुआ से मिलने जा रही है और वह बेहद खुश थी जब घर पहुंचे तो उसने दरवाजे पर भीड़ देखी। उस भीड़ को देखकर भी अनामिका को कुछ समझ नहीं आया । वह रिक्शे से उतरते ही सीधे अंदर की तरफ बुआ बुआ चिल्लाती हुई भागी। मानों उसकी खुशी का ठिकाना ही ना हो। घर के भीतर जाते हैं उसने देखा बुआ बर्फ पर लेटी हुई है । अनामिका को यह भी नहीं पता था कि इसका मतलब क्या होता है ।अनामिका जाकर बुआ को उठाने लगी । बुआ उठो मैं आ गई। उठो ना, पर वह कुछ नहीं बोल रही थी ।दादी चुपचाप वहांँ बैठी थी । अनामिका की यह हरकतें देखकर दादी जोर-जोर से रोने लगी। परंतु अनामिका कुछ भी समझ नहीं पा रही थी। उसने अपनी दादी से कहा दादी बुआ को इस पर से हटाओ उसे ठंड लग जाएगी ।उठाओ ना उसे । तब तक सभी लोग अनामिका को पीछे खींचने लगे । अनामिका को अब कुछ कुछ समझ में आने लगा था । शायद उस बुआ का हाथ उसके हाथ से हमेशा के लिए छुट चुका था । यह अनामिका के जिंदगी की घटना है जो आज भी उसकी आंँखों के सामने जीवंत हो जाती है कभी-कभी। सच ही कहा है किसी ने कोमल मन पर कोई प्रहार अगर हो जाए तो मरते समय तक उसके स्मृतियों भुलाए नहीं भूलती। यह घटना 1986 की है परंतु आज भी जब कभी अनामिका इस घटना के बारे में सोचती हैं तो उसे ऐसा लगता है कि मानों उसके सामने सब कुछ आज ही घटित हो रहा हो ।अजीब है दुनिया का दस्तूर रिश्तों के मोह में बंध जाने के बाद , रिश्ते हाथ से छूट जाया करते हैं । क्या खता थी अनामिका की, अभी कुछ समय पहले तो बेबी बुआ की शादी हुई थी। शादी के तुरंत बाद इस तरीके की घटना ने अनामिका के मन में उसके फूफा के प्रति नफरत भर दी थी। आखरी मौका था जब उसने अपने फूफा को देखा था । उसकी आंँखों में उनके प्रति नफरत साफ दिखाई दे रही थी। क्योंकि उसे अपनी बुआ की मौत की वजह सिर्फ वह इंसान लगा करता था । शायद अगर वहांँ नहीं जाती । शादी नहीं होती तो उसकी बेबी बुआ आज उसके साथ होती । इस बात ने उसके भीतर घर कर लिया था । नफरतों का दौर भी अजीब है ना भावनाओं में उलझ कर कभी इंसान नफरत तो कभी प्यार कर बैठता है। अनामिका की भी शायद इन सभी में कोई गलती नहीं थी , क्योंकि वह अभी बहुत छोटी थी इन बातों को समझने के लिए कि क्या सही और क्या गलत है।।©️®️☯️

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