ग्राम टुडे ख़ास

“रिश़्तों की डोर”

प्रियंका दुबे ‘प्रबोधिनी'”

कोई तोड़ना चाहे तो..
कितना जोड़ू…..?
कोई छोड़ना चाहे तो..
कितना समेटूँ….?
बार-बार रिश़्ते की डोर में
गाँठ देना मुनासिब नही..!
एक समय तो ऐसा आयेगा..
जब डोर गाँठ से भर जायेगी…
कोई जगह न बचेगा और..
जोड़ लगाने की…।
कोई वजह न बचेगी और..
रिश्ता निभाने की..।
खिचाँव डोर कमज़ोर करेंगी..और..
गाँठें उसके सौन्दर्य को…
बदसूरत कर देंगी…
क्या पहले जैसा रह पायेगा..?
रिश़्तों का वजूद..!
नही न!!!
तो….क्या…?
बेहतर ये नही कि…
हम पहली बार टूटने पर ही..
स्वतंत्र छोड़ दें..!
डोर के सौन्दर्य का अस्तित्व
तो न.. बिगड़ेगा…!!
दोनों छोर की मर्यादा तो..
टूटकर न बिखरेगी…!
आँखों को डोर में पड़ी गाँठें..
तो न चुभेंगी…!
क्या कहते हैं…??

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